जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार-पत्र के स्थाई स्तम्भ में प्रकाशित व्यंग्य लेख

Monday, 6 April 2009

काले धन की सफेद माया

काले धन की सफेद माया हमारे नेताऒं का हमेशा एक ही रोना लगा रहता है कि देश के प्रत्येक नागरिक के सर पर भारी कर्जा है ।यहाँ जन नवजात शिशु जन्म लेत है तो कर्जदार बनकर ही पैदा होता है।हालाकि हमारे देश में प्रतिभाऐं बहुत हैं।आजकल तो हमारे बुद्धीप्रकाशों की विदेशों में बहुत माँग भी बड़ रही है फिर भी हमारे देश का कर्ज है कि हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़्ता ही जा रहा है।जानते हैं क्यों..........? देश की जनता पसीना बहा रही है और नेता के रूप में देश की अर्थव्यस्था में लगी घुन देश को चतट करने में लगी है। मुझे भी इसका आभास नहीं था वह तो भला हो हमारी सद्‍बुध्दी दायनी श्रीमती का जो उसने अखबार हमारे सामने पटकते हुऐ कहा-ये देखो हमारे नेता महान......?हम चकराऐ,पूछा क्या हुआ भाग्यवान किसी नेता जी को दिल का दौरा पड गया क्या.......?उनका चेहरा वास्तव में देखने लायक था बोली-उन्हें भला क्यॊम दिल का दौरा पडने लगा , अगर पड भी जायेगा तो उनके बाप का भला क्या जाऐगा....? जेब तो जनता की ही कटनी है....? तुम्हें मालूम है विदेशों में कितना काला धन जमा है...? हमने पूछा- क्यों भाग्यवान विदेशी बैंकों की आडिट करने का काम ले लिया है क्या तुमने.......? वे तपाक से बोली- ५से १४ खरब डालर तक स्विस बैंकों में जमा है यानी लगभग७००खरब रुपये हमारे देश का काला धन विदेशों में पडा धूल चाट रहा है।सुन कर हम भी सन्न रह गये। एक तरफ तो हम कहते हैं कि हमारे देश का बच्चा पैदा होते ही कर्जदार बन जाता है देश की खातिर ,और दूसरी तरफ जनता के भून पसीने का खरबॊं रुपया चन्द कालाबाजार के सरगनाओं के इशारे पर विदेशों में व्यर्थ ही पडा है। ताज्जुब तो इस बात का होता है कि इस पैसे में अधिकांश हिस्सेदारी संभवतः कुछ तथाकथित नेताओं की भी है।वैसे नतागिरी भि आजकल नोट कमाने का अच्छा माध्यम बन गया है। तभी तो एक एम.एल.ए.भी पाँच साल में ही करोडपति बन जता है। जबकि देखा जाऐ तो वेतन तो उस्का एक शूल के अध्यापक के बराबर ही होता है फिर भी उसके पास नोतों का अम्बार लगता जाता है और उतनी ही वेतन पाने वाला एक आम नागरिक बडी मुशकिल से घर खर्चा चला पाता है। हमारे वैज्ञानिक भी पता नहीं क्या करते हैं आज तक कॊई ऐसा इंजेक्शन भी नहीं बना सके जिससे राज करने वाले को लोगों में कुर्सी पर बैठने से पहले यदि लगा दिया जाऐ तो स्वतः ही उसमें ईमानदारी के कीटाणु पदा होने लग जाऐं। अब ऐसे सुन्दर सपने की तो हम और आप केवल कल्पना ही कर सकते हैं शेखचिल्ली के हसीन सपनों की तरह.....? अर्थशास्त्रियों की माने तो हमारे देश पर कुल कर्जा २.२ खरब डालर है। अब यदि काले धन का कुछ हिस्सा मात्र ही यदि भारत में वापस आ जाऐ तो हमारे देश का सारा कर्ज ही चुक जाऐ। और हम दूसरे देशों को ही कर्ज देने लग जाऐ। मगर भला ऐसा क्यों हो जाऐ.....?जो भी दल सत्ता में आता है ख्वाब जरूर दिखाता है कि हम विदेशों में जमा काला धन वापस लाऐगें मगर कुर्सी की ताजपोशी होते ही जाँच में ही पूरा समय निकल जाता है। अब वे भी करें तो क्या करें आखिर.........।क्योंकि वे भी जानते हैं कि कि कालए धन की गेरफ्त में खुद उनके लोग भी आ सकते हैं इसलिऐ बस टैम पास करते रहो बस..........। डॉ.योगेन्द्र मणि

Sunday, 5 April 2009

चूहों पर पहरे की तैयारी

चूहों पर पहरे की तैयारी भैय्या जी आज बडे बेचैन से दिख रहे थे सो हमने उनसे पूछ ही लिया क्या बात है भैय्या जी आज कुछ उदास से लग रहे हो। भैय्या जी ने लम्बी सांस ली और बोले - किसी को चूह काटता है तो दर्द भी होता होगा । हम बोले - भला इसमें कौन सी नई बात है अब चूहा काटे या कुत्ता ,दर्द तो होगा ही ।लेकिन आज तुम्हें भला चूहा कैसे याद आ गया ...।क्या राम नवमी पर गणपती जी ने दर्शन देकर तुम्हें आदेश दे दिया है कि जा बेट चूहों की सेवा करो नहीं तो चूहा तुम्हें काट लेगा....? भैय्या जी बोले - नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं तो सोच रहा था कि यदि मैं अचानक कहीं रास्ते चलते मर जाऊँ तो मेरी गिनती लावारिस के रूप नहीं होनी चाहिऐ नहीं तो मुझे भी महाराव भीम सिंह अस्पताल के मुर्दाघर में पहँचा दिया जाऐगा । हम चकराऐ-भैय्या जी आज आपको भला लावारिस केई तरह मरने का खयाल अचनक कैसे आया भला....? और उसपर भी चूहा बीच में कहाँ से आगया........? भय्या जी बोले -तुम्हें नहीं मालूम क्या ,अखबार में लिखा है की महाराव भीम सिंह अस्पताल में बडे-बडे चूहों का आतंक फैला है.....।हमने कहा चूहें भला कहाँ नहीं हैं आजकल,अब वे भी यदि बेचारे अस्पताल में पहुँच गये तो कौनसा पहाड़ टूट गया जो तुम इतनी बात को लम्बा कर रहे हो। वे बोले -सवाल चूहों का नहीं है । वहाँ के चूहे मुर्दाघर के मुदों को चट कर जाते है। हमारा चौकना स्वाभाविक था बोले- अब चूहे तो चूहें है कुछ तो खाऐगे ही ।तुम्हें मालूम है कई सरकारी दफ्तरों में तो चूहों को फाइलों का आहार मिल जाता है। कुछ दफ्तरॊं में गाय माता का आहार बन जाती है फाइलें ।अब हो सकता है कि चूहा महाराज को आहार के रूप में कुछ मिल नहीं रहा होगा ,। बेचारा कुछ तो खाइगा ही....? भैय्याजी बोले - इसीलिऐ तो मैं सोचता हूँ कि अपनी अंतिम इच्छा रजिस्टर्ड करवाकर हमेशा अपनी जेब में अपनेसाथ ही रखूं ताकि भगवान न करे कभी अकेले में अपनी बेटरी बन्द हो जाये तो कम से कम कोई मुझे इस विशाल काय अस्पताल में न ले जाये नहीं तो मेरे शरीर का भी ये चूहे कुतर-कुतर कर हुलिया ही बदल देगें। हम उन्हें यह कैसे समझा सकते थे कि मरने के बाद की चिन्ता भला अभी से ही वे क्यों कर रहे हैं। यूं भी मरने के बाद किसे पता रहेगा कि हमारे शरीर का किसी ने क्या किया। मगर नहीं साहब उन्हें तो अपने मुर्दे की चिन्ता जिन्दा शरीर से भी ज्यादा सता रही थी। बोले-यदि ऊपर वाले के दरबार में मेरा आधा अधूरा शरीर पहूँचेगा तो वह भला कैसे पहिचानेगा कि मैं हि वो हूँ जिसका फरमान उसने भेजा था। ओर गलती से वापस उसने मेरे अधूरे शरीर की पूर्ती के लिऐ किसी और के शरीर को वहाँ बुला लिया तो.......?व्यर्थ में ही मरे साथ किसी ओर के परिवार का भी नुकसान हो जाऐगा। उनकी चिन्ता भी वाजिब थी।ऊपर वाले के यहाँ बिना नाक कान या बिना आँख के कोई पहुँचेगा तो वास्तव में किसीको भी अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन कोई भला कर भी क्या सकता है।सरकार ने तो जाँच के आदेश दे दिऐ हैं। जो भी होगा देखा जाऐगा फिलहाल तो चूहों का आनन्द ही आनन्द है। (जन जागृति पक्ष में ०५/०४/०९ को प्रकाशित डॉ।योगेन्द्र मणि

चूहों पर पहरे की तैयारी

चूहों पर पहरे की तैयारी भैय्या जी आज बडे बेचैन से दिख रहे थे सो हमने उनसे पूछ ही लिया क्या बात है भैय्या जी आज कुछ उदास से लग रहे हो। भैय्या जी ने लम्बी सांस ली और बोले - किसी को चूह काटता है तो दर्द भी होता होगा । हम बोले - भला इसमें कौन सी नई बात है अब चूहा काटे या कुत्ता ,दर्द तो होगा ही ।लेकिन आज तुम्हें भला चूहा कैसे याद आ गया ...।क्या राम नवमी पर गणपती जी ने दर्शन देकर तुम्हें आदेश दे दिया है कि जा बेट चूहों की सेवा करो नहीं तो चूहा तुम्हें काट लेगा....? भैय्या जी बोले - नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं तो सोच रहा था कि यदि मैं अचानक कहीं रास्ते चलते मर जाऊँ तो मेरी गिनती लावारिस के रूप नहीं होनी चाहिऐ नहीं तो मुझे भी महाराव भीम सिंह अस्पताल के मुर्दाघर में पहँचा दिया जाऐगा । हम चकराऐ-भैय्या जी आज आपको भला लावारिस केई तरह मरने का खयाल अचनक कैसे आया भला....? और उसपर भी चूहा बीच में कहाँ से आगया........? भय्या जी बोले -तुम्हें नहीं मालूम क्या ,अखबार में लिखा है की महाराव भीम सिंह अस्पताल में बडे-बडे चूहों का आतंक फैला है.....।हमने कहा चूहें भला कहाँ नहीं हैं आजकल,अब वे भी यदि बेचारे अस्पताल में पहुँच गये तो कौनसा पहाड़ टूट गया जो तुम इतनी बात को लम्बा कर रहे हो। वे बोले -सवाल चूहों का नहीं है । वहाँ के चूहे मुर्दाघर के मुदों को चट कर जाते है। हमारा चौकना स्वाभाविक था बोले- अब चूहे तो चूहें है कुछ तो खाऐगे ही ।तुम्हें मालूम है कई सरकारी दफ्तरों में तो चूहों को फाइलों का आहार मिल जाता है। कुछ दफ्तरॊं में गाय माता का आहार बन जाती है फाइलें ।अब हो सकता है कि चूहा महाराज को आहार के रूप में कुछ मिल नहीं रहा होगा ,। बेचारा कुछ तो खाइगा ही....? भैय्याजी बोले - इसीलिऐ तो मैं सोचता हूँ कि अपनी अंतिम इच्छा रजिस्टर्ड करवाकर हमेशा अपनी जेब में अपनेसाथ ही रखूं ताकि भगवान न करे कभी अकेले में अपनी बेटरी बन्द हो जाये तो कम से कम कोई मुझे इस विशाल काय अस्पताल में न ले जाये नहीं तो मेरे शरीर का भी ये चूहे कुतर-कुतर कर हुलिया ही बदल देगें। हम उन्हें यह कैसे समझा सकते थे कि मरने के बाद की चिन्ता भला अभी से ही वे क्यों कर रहे हैं। यूं भी मरने के बाद किसे पता रहेगा कि हमारे शरीर का किसी ने क्या किया। मगर नहीं साहब उन्हें तो अपने मुर्दे की चिन्ता जिन्दा शरीर से भी ज्यादा सता रही थी। बोले-यदि ऊपर वाले के दरबार में मेरा आधा अधूरा शरीर पहूँचेगा तो वह भला कैसे पहिचानेगा कि मैं हि वो हूँ जिसका फरमान उसने भेजा था। ओर गलती से वापस उसने मेरे अधूरे शरीर की पूर्ती के लिऐ किसी और के शरीर को वहाँ बुला लिया तो.......?व्यर्थ में ही मरे साथ किसी ओर के परिवार का भी नुकसान हो जाऐगा। उनकी चिन्ता भी वाजिब थी।ऊपर वाले के यहाँ बिना नाक कान या बिना आँख के कोई पहुँचेगा तो वास्तव में किसीको भी अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन कोई भला कर भी क्या सकता है।सरकार ने तो जाँच के आदेश दे दिऐ हैं। जो भी होगा देखा जाऐगा फिलहाल तो चूहों का आनन्द ही आनन्द है। (जन जागृति पक्ष में ०५/०४/०९ को प्रकाशित डॉ।योगेन्द्र मणि

Saturday, 4 April 2009

गोलमा का ओलमा

गोलम का ओलमा हमारे देश में नारी का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मेरे देश की नारियां अपने पति की आन- बान और शान के लिऐ बड़ी से बड़ी कुर्बानी से भी नहीं घबराती थी।तभी तो हमारे देश की नारियों को पतिव्रता नारी, देवी और न जाने किन किन सम्बोधनों से नवाजा जाता रहा है। वैसे पतिव्रता नारी आजकल इतिहास की वस्तु बनती जा रही है बड़ी मुश्किल से इस एतिहासिक घरोहर के दर्शन हो पाते हैं।लेकिन राजस्थानी घरती तो इस मामले में वैसे भी सबसे आगे है।यहाँ की महिलाऐं तो अपने पति के लिऐ सती तक होनें में भी नहीं घबराती हैं। सरकारी कानून लागू होने के बाद अब सती तो कोई होता नहीं है।लेकिन पतिव्रता होने पर कोई पाबन्दी नहीं है। आजकल तो राजनीति में पत्नीव्रत नेता भी पैदा हो गऐ हैं। जो कि पत्नी के लिऐ अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिऐ तत्पर रहते हैं। कोई अपनी पत्नी को एम.पी.बनवा रहा है तो कोई एम.एल.ए.,या मन्त्री तक बनवाने के लिऐ पूरे दाव पेचों का उपयोग आजकल नेता जी करते रहते हैं।अब पत्नी का भी तो कुछ नैतिक दयित्व होता ही है । तभी तो राजस्थान सरकर में नई-नई बनी महिला मन्त्री जी ने भी पति के लिऐ शहीद होने वालों में अपन नाम दर्ज करा ही दिया। आदरणीया गोलमा देवी ने गहलोत सरकार को ओलमा देते हुऐ मन्त्री पद को छोडने की पेशकश कर ड़ाली है। सुना है सोनिया जी को स्तीफा सौपा है। अब सबसे पहला प्रश्न मेरे दिमाग में कुलबुला रहा है कि उन्होंने स्तीफा लिखा कैसे होगा ,क्योंकि वे ही एक मात्र ऐसी मन्त्री हैं जिनके लिऐ काला अक्षर भैस बराबर है।साफ है स्तीफा लिखा भी उनके पति परमेश्वर माननीय किरोड़ी जी ने होगा और भेजा भी उन्होंने ही होगा । गोलमा मैय्या जी बन गई पतिव्रता पत्नी.....।इसपर तुर्रा ये कि मैं अपने पति का अपमान नहीं सह सकती। है न बड़ी अजीब सी बात ....? राजनीति में भला किसका अपमान और कैसा अपमान.........? आज जो कमल का बोझा ढ़ो रहा है कल का कोई पता नहीं कि वह किस झण्डे के नीचे खड़ा मिले। कुछ लोग झण्डे के लिऐ जान तक देने की कसमें सरेआम खाते है और वे ही रातों रात न जाने किस वाशिंग मशीन में ब्रेन वाश कराकर आते है कि रात को उन्होंने क्या कहा सब भूल जाते हैं।नई सुबह नये वादे, नई पार्टी ,सब कुछ नया -नया सा , शायद उन्हें भी अच्छा लगता है और जनता तो भोली है ही वह तो यह तक भी भूल जाती है कि कौन नेता जी कब आये और चले गये ।नेता जी के अतीत और वर्तमान से उसे कोई सरोकार ही नहीं है।ठीक भी है जब किसी नेता को ही अपना अतीत को याद रखने का समय नहीं है तो भला जनता को क्या पडी है...? नेताजी हैं कि अपनी पत्नी,बच्चे और पारिवारिक लोगों के भविष्य की चिन्ता में ही जीवन निकल देते हैं। जनता की सुध लेने का समय तो मात्र चुनाव के समय कूछ दिनों का ही मिल पाता है।ऐसे में गोलमा जी का ओलमा हमें तो वाजिब ही लगा वह एक अलग बात है कि भले ही वे कॉग्रेस की सदस्य नहीं हैं फिर भी स्तीफा कॉग्रेस पार्टी की अध्यक्ष् को भेजा है जिससे तो लगता है जैसे मूक भाषा मे कह रही हॊं कि हे सोनिया जी भले ही हम पार्टी के नहीं है फिर भी पार्टी के ही तो हैं आज नहीं तो कल तुम्हारी ही शरण में आना है फिलहाल दलबदल कानून से तो बचाऐ रखो वरना मुफ्त में ही पार्टी की सदस्यता लेते ही विधान सभा की सदस्यता से ही हाथ धोना पडेगा...कुछ तो रहम करो सोनिया जी हमारे पति रूपी परमेश्वर पर.........! ! डॉ योगेन्द्र मणि

Friday, 3 April 2009

करे कोई भरे कोई

करे कोई भरे कोई आउट-आउट हर जगह से एक ही आवाज आ रही है। पहले यह आवाज केवल क्रिकेट के खेल के मैदान से ही आती थी लेकिन आजकल यह आवाज राजस्थान बोर्ड के परीक्षा केन्द्रॊं से आ रही है। रोजाना कहीं न कहीं से शोर सुनाई देता है कि आज फंला पेपेर बाजार में बिक रहा है और आज फंला.........?आखिर माजरा क्या है ये तो ऊपर वाला ही जाने मगर भैय्या जी ने कुछ अजब ही दासता बयान की।भैय्या जी का कहना है कि गधे ने लात मारी राहगीर को जेल हो गई। हम उलझन में हमने कहा भैय्या जी बात क्या है हमारी कुछ समझ में नहीं आई। इसपर जुम्मन चाचा बोले -अखबार भी पढ़ते हो या केवल लिखते ही हो। कुछ पढ़ भी लिया करो।तुम्हें मालूम है एक परीक्षा केन्द्र पर दो दिन पहले ही आने वाला पेपर बांट दिया और जब गलती का अहसास हुआ तो सभी छात्राओं को वहीं स्कूल में ही अगली परीक्षा तक रोक लिया गया। इसपर भैय्या जी बोले - अब आप ही बताए कि उन लड़कियों का भला क्या दोष था जो उन्हें तीन दिन की सजा बैठे ठाले ही मिल गई।जुम्मन चाचा बोले- - वही तो मैं कह रहा हूँ कि गलती पेपर लाने वाले की , फिर बांटने वाले की, अब छात्राओं ने तो कहा नहीं था कि हमें आने वाला पेपर पहले चाहिऐ। भैय्याजी ने कहा --वह तो मीडिया में बात आ गई इससे लड़कियों को छोड़ना पड़ा वरना तीन दिन तन बिना अपराध के सजा ही हो गई थी उनेको तो.....?जुम्मन चाचा ने बात बढ़ाते हुऐ कहा _ तुम्हें मालूम है बोर्ड अध्यक्ष क कहना है कि मैनें कहा है लड़कियों को रोकने के लिऐ....। बात अजीब सी तो लगती है लेकिन है सोलह आने सही।वो तो भला हो जगरुक मीडिया का और साथ ही कुछ संगठनों का जिन्होंने बात को उठाया और बालिकाओं को आजाद कराया।वरना गुपचुप रूप से बालिकाओं को तो बिना बात ही हो गई थी जेल और जिसने गलती की वह मजे में घूम रहा था। -ठीक है मानविक भूल हो जाती है तो भला यह भी क्या तरीका हुआ....? अब लगता है राजस्थान बॊर्ड न हुआ कोई बिना पहरेदार की झोपडी हो गई जहां से कोई भी जाओ किसी भी पेपर को उठाकर बाजार में बेच आओ। और वे हैं कि रोजाना वही घिसा पिटा जबाब कोई पेपर आउट नहीं हुआ मात्र संयोग है कि कुछ प्रश्न मिल गये । वाह रे संयोग भाषा तक परीक्षा के पेपर से मिलती है इन गैस पेपर की। लगता है पूरे कूऐ में ही भाँग मिली हुई है । तभी तो किसी को कुछ सूझता ही नहीं है।इसपर बोर्ड अध्यक्ष जी का तुर्रा यह कि मेरे कहने पर रोका है लडकियों को ।सरकार कहती है कि जाँच करेगें....आखिर किसकी जाँच करना चाहती है सरकार ......!हमारी तो समझ से बाहर है।हालाँकि विद्यालय के वीक्षक तथा परीक्षा अधीक्षक को निलम्बित कर दिया है ।लेकिन जिसके आदेश पर छात्राओं को दो दिन तक की कैद भोगनी पड़ी उसका क्या हुआ.......?वो तो अभी तक मजे में हैं । गलत पेपर बांटने वालों को तो सजा मिलनी चाहिऐ, मिलेगी भी......लेकिन बोर्ड अध्यक्ष जी का क्या होगा कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। और होना भी नहीं चाहिऐ ....?क्योंकि वे तो मालिक है और मालिक गलती करते ही नहीं......... वे तो केवल आदेश देते हैं या फिर सजा देते हैं.......बस.....तभी तो -- क्षमा बडन का हक बनें दिओ छोटों को लटकाय, इन अफसर के कारणे हम तुम धक्का खायें ॥ (जन जागृति पक्ष दैनिक में आज ०३/०४/०९ को ) डॉ.योगेन्द्र मणि

Thursday, 2 April 2009

लड्डू उनकी जेब का

लड्डू उनकी जेब का कई बार इधर उधर से आवाजें आती रहती हैं कि वह अब आई-अब आई...खुल गई,खुलने वाली है.......और अब तो ही गई ......?आप सोचते होगें क्या पहेली है भला ......? तो जनाब राजस्थान में अभी पिछले दिनों महारानी जी का राज था,आपको मालूम है अब आप कहेंगें इसमें नया क्या हुआ....?नया तो कुछ नहीं पर महारानी जी ने कोटा वासियों के दिल में एक सपना जगाया था आई.आई. टी का ।बस तभी से कोटा वासियों को रात में बार बार आई.आई.टी. के हसीन और डरावने ख्वाब दिखाई देते रहते हैं।सबको लगता रहता है कि बस अब आई अब आई आई.आई.टी. कोटा की झोली में ।जब कभी भी अखबारों के किसी कोने में आई.आई.टी.छपा नहीं कि घंटाघर से लेकर पतली लम्बी गलियों तक में विशेषज्ञों की तरह हर कोई अपने ज्ञान का पिटारा खोल कर बैठ जाऐगा जैसे अभी तक सो- पचास यूनिवर्सिटी का कुलपति रह चुका हो.....।गोया आई.आई.टी.न हुई कोई अलादीन का चिराग हाथ लग जाऐगा जिससे कोटा रातों रात मुंबईया चेन्नई बन जाऐगा। अभी कल ही मैनें जुम्मन चाचा से यूँ ही पूछ लिया-आई.आई.टी. यदि कोटा में खुल जाऐ तो तुम्हें कैसा लगेगा.....?इसपर वे तुरन्त बोले -ये भी कोई सवाल हुआ.....।मुझे अच्छा लगे या बुरा किसी पर क्या फर्क पडता है....?पूछना ही है तो यह पूछो कि नेताओं को कैसा लगेगा..........यदि आई.आई.टी.आई तब भी और नहीं आई तब भी....? तभी दूसरे कोने से भैय्या जी प्रकट होते हुऐ बोले-जब यहाँ उनकी सरकार थी तो मौजूदा सरकार वाले टांग खिचाई करते हुऐ कहते थे कैसी सरकार है दमदारी से बात नहीं कह पा रही कोटा के हक को हम लेकर रहेगें .......।लेकिन आज जब यहाँ भी उनका राज और वहाँ भी उनका राज तब भला इनके मुँह पर ताले कैसे पडे है समझ नहीं आता ....? हमारे मुख्यमंत्री जी कहते हैं गृहमंत्री आपका सडक मंत्री आपका ,पंचायत मंत्री आपका.....हाडोती के तीन-तीन दमदार नेता है ।लेकिन अर्जुन सिंह की हेकडी कहें या गहलोत जी की आंतरिक मंशा.......कि इन दमदारों की बोलतॊ बंद है......? अब देखा जाऐ तो आई.आई.टी की राजनीति केवल घंटाघर से होते हुऐ रेलवे स्टेशन के प्लेट्फार्म पर दिल्ली का रास्ता ही भूल जाती है।यहाँ तो स्थिति यह हो गई है कि जब भी किसी को सपने में आई.आई.टी. की फोटो दिख जाती है तो दूसरे ही दिन चार आदमियों को साथ लेकर चल देता है ज्ञापन देने ।अखबारों में समचार आ जाता है फोटो छप जाती है बस हो गया अपना पूरा कर्तव्य....? लिखा दिया हमनें भी आई.आई. टी. के लिऐ आंदोलनकारियों में अपन नाम ......\ बस इतने से ही सीना चार इंच फूल जाता है। हो गया उपकार कोटा की जनता पर .......!अब और बेचारे इससे ज्यादा कर भी क्या सकते हैं....? अब भला इन्हें कौन समझाऐ कि अर्जुन सिंह के अडियाल दंभ को तोडने के लिऐ इससे कुछ नहीं होगा । क्यॊकि लगता है कोटा वालों ने पिछले जनम में जरूर कोई बुरे कर्म किऐ होगें तभी तो इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा तक के सेंटर भी उन्होंने कोटा से हटा दिये और नेता जी खामोश हैं क्योंकि उनके बच्चों को तो देनी ही नहीं हैं ये परीक्षाऐं.....। हमारी जनता भी कितनी भॊली है कि बेचारी दूसरों के भरोसे बैठी है।बंधु जागो अब तो जागो.....? अब दिल्ली दरबार का दरवाजा खटखटाना पडेगा...और उन्हें अच्छी तरह समझाना पडेगा कि यह कोई उनकी जेब का लड्डू नहीं है जो जब चाहा दिखा दिया जब चाहा किसीको भी जाकर थमा दिया..........? (कोटा राज से प्रकाशित जनजगृती पक्ष दैनिक में २।०४।०९ को छपा )डॉ.योगेन्द्र मणि

तलाश उम्मीदवार की

तलाश उम्मीदवार की चुनाव तो चुनाव हैं चाहे पंचायत समिती के हों ,नगर पालिका, निगम या फिर विधान सभा अथवा लोकसभा के ही क्यों न हों ।चुनाव की घोषणा हुई नहीं कि घण्टाघर की तंग गलियों से लेकर जुम्मन चाचा और र्भैय्या जी की जुबान पर चुनाव को लेकर कभी भी वाक युध्द छिड़ जाता है।कमल वालों ने तो अपने उम्मीदवार को जनता के आगे लाकर खड़ा कर दिया लेकिन हाथ वालों के हाथ अभी खाली ही हैं । बस इसी बात को लेकर जुम्मन चाचा और भैय्या जी उलझे हैं। भैय्या जी बड़ी सोच में है बोले-जुम्मन चाचा, कॉग्रेस पार्टी का उम्मीदवार कहाँ गायब हो गया जो अभी तक मिल ही नहीं रहा है। आखिर माजरा क्या है ? जुम्मन चाचा तपाक से बोले यह बात तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो...--? मैं कोई पार्टी का नेता हूँ --?भैय्या जी तुरन्त बोले नहीं मैं तो यूँ ही जिक्र कर रहा था ।अब बॉरा-झालावाड़ में तो नये नेता भाया जी तुरन्त अपने घर का ही उम्मीदवार ले आये,फिर यहाँ भला कैसा अकाल पड़ा है जो इन्हें कोई मिल ही नहीं रहा । जुम्मन चाचा बोले-तुम्हें मालूम नहीं यहाँ नेताओं की कमी थोडा ही है यहाँ तो हर कोई लाइन में लगा है।सवाल यह है कि आखिर टिकट दें तो दें किसको.....?भैय्या जी ने बात बढाते हुऐ कहा - हमें तो लगता है यहाँ पार्टी की नाक के सवाल से ज्यादा अब गृहमंत्री जी की नाक का आ गया है। इसपर जुम्मन चच बोले-देखा जाऐ तो हमें भी कुछ ऐसा ही लग रहा है।एक तरफ जहाँ बॉरा-झालावाड़ क्षेत्र में नये मन्त्री जी अपने पैर मजबूत करने में लगे हैं वहीं हमारे गृहमन्त्री जी तो पहले से ही मजबूत है ,वे भला अपने क्षेत्र में किसी भी ऐसे व्यक्ति को टिकिट क्यॊं दिलाऐगें जिससे उनके नम को बट्टा लगे । कल को लोग भला क्या कहेगें ?जो आदमी पूरे प्रदेश की व्यवस्था सम्भालें हुऐ हैं लेकिन अपना शहर ही नहीं सम्भाल पा रहा है। हमारे विचार से अब सबसे बड़ा झमेल तो यह फंस गया कि हडोती के दो ऐसे मन्त्री जो आपस में गुरू चेले भी है।दोनों की ही शन का सवाल है।चेले जी के करण बरसों बाद कॉग्रेसियों को उम्मीद जगी है कि वे महारानी जी के लाड़ले का सामना भी कर सकेगॆं। वरना अभी तक तो केवल मजबूरी में ही किसी न किसी कॊ बळी का बकरा बनना पड़ता था महारानी जी के सामने। अब ये भी उम्मीदवार घोषित करें भी तो कैसे करें ,जहाँ एक तरफ किरोडी़ जी का रोडा़ बीच में आता है तो दूसरी तरफ गुंजल की गूँज कानों तक पहुँचती है।इन सब के बीच धरीवाल जी की धार का भी सवाल अटका हुआ है।क्योंकि कहीं एसा न हो जाऐ कि फाइनल परीक्षा में गुरूजी के नम्बर कम न आ जाऐं-----? वरना कल को लोग तो ये ही कहेंगे कि गुरू जी तो गुड़ रह गये और चेला-------???आपके साथ हम भी थोड़ा और कर लेते हैं इंतजर देखते है कि आखिर ऊँट किस करवट बैठता है --- ? (उपरोक्त लेख कोटा से प्रकाशित -जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार पत्र १.०४.०९के अंक में मेरे स्थाई स्तम्भ में छपा है) डॉ. योगेन्द्र मणि