जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार-पत्र के स्थाई स्तम्भ में प्रकाशित व्यंग्य लेख
Saturday, 11 April 2009
जूता फैंक प्रतियोगिता शुरू
जूता फैंक प्रतियोगिता शुरू
आजकल एक महारोग छूत के रोग की तरह फैलता हुआ प्रतीत हो रहा है। जिस तेजी से इसका प्रसार हो रहा है उसे देखकर सोचने पर मजबूर होना पडता है कि आखिर क्या होगा इस देश का......?वैसे तो हमारे देश की जनता हर विदेशी उत्पादन की बडी खूबसूरती से नकल कर लेती है ऐसा प्रायः सुना जाता है। कई बार तो नकल ही असल से ज्यादा असली लगती है। अब चाहे वह इलेक्ट्रोनि आइटम हो या अन्य घरेलू सामान। सभी मामलों में नकल में हमारा कोई मुकाबला नहीं है ।
हमारे वैज्ञानिकों का लोहा अमेरिका जैसा देश भी मानने लगा है ।
लेकिन आजकल बिना सोचे समझे हर अच्छी बुरी बात की नकल करना भला कहाँ की अकलमंदी है।इस मामले मे कोई माने या न माने हमारी श्रीमती जी का दिमाग सुपरफास्ट ट्रेन की तरह दौड़ता है। आज सुबह ही हमारे जूतों की कहानी क्या पढ़ी, कि हो गई राशन पानी लेकर चालू.। बोली- तुम काहे को अच्छे भले प्रजातंत्र की प्रजा को बिगाडने पर तुले हो ....?
हम हैरान -भाग्यवान यह आप क्या कह रही हैं । सभी कहते हैं कि हम जनता को राह दिखाने का काम करते हैं और आप हैं कि उलटा हमें ही दोष दे रही हैं कि हम जनता को बिगाड़ रहे हैं....।
वे फौरन बोली ओर नहीं तो क्या अमेरीका के बुश पर हो या भारत के गृह मन्त्री पर जूता फैंक कार्यक्रम भला किसने प्रारम्भ किया....? पत्रकारों ने ही न....? तो अब भुगतने के लिऐ तैयार रहो....। देश में जूता फैंक प्रतियोगिता प्रारम्भ हो गई है । आज एक भूतपूर्व अध्यापक ने आपका अनुसरण किया है एक सांसद पर जूता फैंक कर....। हम बड़बड़ाऐ -भागयवान जरा धीरे बोलो पड़ोसी सुनेगें तो क्या सोचेगें जैसे सचमुच हमने ही जूता फैंक प्रतियोगिता आयोजित करवा रखी हो। मैं तो किसी पर फूल तक फैंकने से घबराता हूँ और तुम हो कि सीधे ही मेरा नाम ले रही हो ...।वे तपाक से बोली - मेरा मतलब तुम्हारी पत्रकार बिरादरी से है।रास्ता तो उन्होंने ही दिखाया है तभी तो आज फिर जूता फैंका गया । आज जूते का शिकार एक सांसद को होना पड़ा...? क्या यही हमारी सभ्याता है...?
वास्तव में श्रीमती जी की बात तो सही है। और वो भी सोलह आने.....। विरोध जताने का भला यह कौनसा तरीका हुआ...और वह भी पढ़े लिखे सभ्य कहलाने वाले लोगॊं के द्वारा.......।ऐसा लगने लगा है जैसे जूता फैंक प्रतियोगिता हो रही है कि किसका निशाना कितना सही लगे....?
प्रश्न अब यह उठता है कि आखिर ऐसी स्थितिया पैदा ही कैसे हो गई जो आज जनता के प्रतिनिधी कहलाने वाले लोगों को जनता का आक्रोश इस तरह सहना पड़ रहा है। कथित प्रतिनिधी कहलाने वाले लोगों को सही मायने में जन प्रतिनिधी बनना होगा वरना एक समय ऐसा आयेगा कि ऐसे हादसे बढ़्ते जाऐगे और आप और हम एक दूसरे का मूँह देखते ही रह जाऐगें।
(जन जागृति पक्ष में मेरे स्थाई कॉलम में 11-04-09 को प्रकाशित)
डॉ. योगेन्द्र मणि
Friday, 10 April 2009
एक के साथ एक जोडी जूता फ्री
एक के साथ एक जोड़ी जूता फ्री
कल शाम को हमने सोचा कि चलो आज नये जूते ही खरीद लिऐ जाऐ। कई दिनों से हमारे एक पैर का पंजा जूते से बाहर निकलने की नाकाम कोशिश कर रहा था। हम जूते वाले की दुकान में पहुँचे और सस्ता, मजबूत टिकाऊ सा जूता दिखाने के लिऐ कहा तो उसने हमें पहले तो ऊपर नीचे तक निहारा फिर बोला-आप वही हैं न जो अखबार में फोटो के साथ रोजाना छपते हैं ।
हम मन ही मन गद्-गद हो गये चलो इतने बडे शहर में कोई तो मिला जो हमें पहिचानता है।वरना श्रीमती जी तो हमेशा कहती रहती हैं कि दिन भर कलम घसीटने से भला क्या फायदा...? अब हम उनसे कह सकते हैं कि कलम घसीटन से ही आज इतने बडे शहर में जूते वाला तक हमें पहिचनता है। हमनें उससे बडी आत्मीयता से पूछा-लगता है आप मेरा लिखा रोजाना पढ़ते हैं ?वह बडी शराफत से बोला _ पढ़ना कहाँ हो पाता है साहब...अब हम आपकी तरह निठल्ले तो हैं नहीं .....? दिन भर काम से ही फुरसत नहीं मिल पाती वो तो आपकी फोटो भी छपती है इसलिऐ पहिचान लिया ।शाम को आपकी फो्टो वाला अखबार जूतो की पेकिंग में ही काम आता है।
हमने जान पहिचान बढ़ाने की छोड़कर जुते दिखाने का आग्रह किया तो वह बोला- कितने जूते चाहिये आपको....? हमने कहा -कितने क्या एक जोडी जूते लेने हैं, अब एक बार में एक ही जोड़ी पहिन सकेगे....? दुकानदर ने सिर खुजलाते हुऐ कहा - तो आपको जूते पहिनने के लिऐ चाहिऐ...?
हम चकराऐ- श्रीमान जी जूते पैरों में पहिनने के लिऐ ही होते हैं उन्हें गले में तो लटकाया नहीं जा सकता ? वह तुरन्त बोला- बुरा मत मानियेगा साहब आजकल आपकी बिरादरी में जूता फैक प्रतियोगिता जो चल रही है, बस इसीलिऐ पूछ लिया था मैनें तो ।आगे आपकी मरजी है आप जूते गले में गले में लटकाऐं या फिर किसी नेता के ऊपर फैकें..?
हम बोले- आखिर आप कहना क्या चाहते हैं..?दुकानदार ने हमें समझाते हुऐ कहा-देखिऐ श्रीमान जी पहले अमेरिका के राष्ट्रपति पर आपकी ही बिरादरी के व्यक्ति ने जूता फैका था अब उसीका अनुसरण करते हुऐ यहाँ भी एक पत्रकार ने मन्त्री जी पर जूता फैक दिया इसीलिऐ मैंने आपसे पूछ था कि कहीं आपको भी फैकने के लिऐ जूते चाहिऐं क्या......?मेरे पास बहुत सा डेड स्टोक पड़ा है। यदि आपकी महरबानी हो जाऐ तो अपने मित्रों को भी हमारी दुकान का पता बताना ,आपको स्पेशल डिस्काउन्ट मिल जाऐगा.....एक जोड़ी फैकने वाले के जूतों के साथ पहिनने के जूते मुफ्त.....!
अब हम भी भला क्या जबाब देते उसके इस ऑफर का...?हमने फिलहाल जूते पहिनने का अपना कार्यक्रम स्थगित किया और चुपचाप वहाँ से बाहर निकल लेना ही उचित समझा ।अब ऐसे सिर फिरे लोगों का कोई कर भी क्या सकाता है जो कलम हाथ में लेकर जूते से अपनी बात समझान चाहते हैं........?
( दैनिक जन जागृति पक्ष में 10-04-09 को प्रकाशित )
डॉ. योगेन्द्र मणि
Thursday, 9 April 2009
जय हो के भय हो से कै हो
जय हो के भय हो से कै हो
हमारे देश से जब कोई विदेश जाकर वापस आ जाता है तो उसका मान सम्मान ,आदर सत्कार कुछ ज्यादा ही होने लगता है। हमारी सोच , उस व्यक्ति के प्रति बदल जाती है।क्योंकि फोरन रिटर्न का तमगा जो लग जाता है सीने पर....।लगता है हीरे की पहिचान केवल विदेशी लोगों को ही होती है। तभी तो फोरन का ठप्पा लगा नहीं कि लगे सभी उसके पीछे दौडने......!कुछ दिनों पहले टी.वी. पर शोर था, जय हो ...जय हो.......विदेश में एवार्ड मिला था जय हो को....सभी आँख बन्द कर दौड़ पड़े....जय हो के पीछे....।एक पार्टी ने तो बाकायदा ‘जय हो’ को रजिस्टर्ड भी करा लिया है। लेकिन कल तो गजब हो गया जुम्मन चाचा की जुबान पर जय हो की तर्ज पर नये ही शब्द थे। वे गुनगुना रहे थे भय हो.....भय हो........। हमने जुम्मन चाचा को समझाया -भला यह कौन सा नया सुर अलाप रहे हो.....भय हो.....भय हो......। सही गाना भय हो नहीं जय हो है.. जब गाने का शोक ही पाल रहे हो तो जरा ठीक से पालो और सही गाओ।जुम्मन चाचा हमारा मुँह ताकने लगे ,बोले -आप भी क्या गजब करते है।जय हो तो हाथ वाली पार्टी का है हमारा तो भय हो, ही है ।वे जय हो रजिस्टर्ड करा सकते हैं तो हम भी किसीसे कम थोड़ा ही हैं हम भय हो गायेगें।हमने पूछा -जुम्मन चाचा ‘भय’ भला किससे.....जनता से...कॉग्रेस से या फिर आपकी पार्टी से......? या फिर गुलजार साहब के जय हो से......? तभी हमें एक दूसरा ही स्वर कै हो....कै हो.....सुनाई दिया। हमने देखा कि भैय्या जी मस्ती में गाते हुऐ आरहे है....कै हो कै हो......। हमने भैय्या जी को स्वर पर ब्रेक लगाने को कहते हुऐ पूछा - भैय्या जी क्यों अच्छे भले गाने का बन्टाढ़ार करने पर तुले हो.......? तुम्हें कै नहीं हो रही तो क्यों चिल्ला रहे हो कि कै हो ...कै हो.....? लोग तो कै बन्द करने की दवा लेते हैं और तुम हो कि स्वर में गा -गा कर कह रहे हो- कै हो ....कै हो.......? कुछ उलटा सीधा तो नहीं खा लिया था कहीं...?(राजस्थान में कै ,उलटी होना या वमन को कहते हैं),लेकिन उन्होंने हमें बतया कि जय हो कि तरह ही एक पर्टी का यह भी चुनावी गीत है --कै हो.. कै हो....।बडी अजीब बात है सभी एक ही गाने के पीछे पडे है...आखिर विदेशों ने इस गीत को एवार्ड से जो नवाज गया है। गुलजर को ऑस्कर मिला है तो इन्हें लगता है कि गीत जरूर लकी है जिसके कारण ए.आर .रहमान कॊ भी ऑस्कर मिल गया। अब रहमान को गुलजार के कारण ऑस्कर मिला या गुलजार को रहमान के कारण....इसपर बहस बाद में फिलहाल तो सबको ऐसा लगता है कि इस धुन से ही उन्हें लोकसभा में बहुमत जरूर मिल जाऐगा...........?अब यह तो वक्त ही बताऐगा कि जय हो से किसको भय लगता है और किसको कै होती है और किसकी कै बन्द होती है...........?
(दैनिक जन जागृति पक्ष में 09-04-09 को प्रकाशित)
डॉ.योगेन्द्र मणि
Wednesday, 8 April 2009
राम से बडा राम का नाम
राम से बडा़ राम का नाम
भैय्या जी ने जैसे ही हमारे घर में प्रवेश किया बडे जोर से बोले -जय श्रीराम.........! जय श्रीराम का उद्घोष सुनकर हम चकराये,आज भैय्या जी को आज अचानक भला क्या हो गया जो इतनी जोर से जय श्रीराम कहना पड़ रहा है । हमने पूछ ही लिया- भैय्या जी आज तो बडे दिनों क्या बरसों बाद आपके मुँह से राम जी का नाम सुना है आखिर क्या बात है जो आज राम जी की याद आ गई ।
भैय्या जी ठहरे सीधे सच्चे जीव बोले तुम्हें मालूम नहीं चुनाव आ रहे हैं ।अब राम ही तो एक मात्र सहारा हैं। हमने तो घोषणा कर दी है कि राम मन्दिर जरूर बनाऐगें।हम बोले- भैय्या जी पिछली बार भी तो आपको मौका मिला था राम मन्दिर बनाने का,भला तब क्यों नहीं बनवाया राम मन्दिर......?वे बोले -आप भी क्या बात करते हैं जरा सोचो यदि तभी बनवा देते तो आज भला हम तुम्हारे सामने क्या कहते.....?वैसे भी जब हमारे सामने राम जी के मन्दिर से ज्यादा जरूरी कुछ और भी काम थे उन्हें भी तो करना था। तब हमने भी सोचा कि कुछ मुद्दा तो ऐसा होना ही चाहिऐ अपनी जेब में जिसे जब चाहो उपयोग कर लो। अब राम जी के नाम से अच्छा भला क्या हो सकता है...?
हमने कहा - यह तो सरासर ना इंसाफी है जनता के साथ। तुम्हारी बातों से तो लगता है कि तुम्हें केवल मुद्दा चाहिऐ ,राम जी नहीं। इसपर वे तपाक से बोले- राम जी का भला किसी को करना भी क्या है । ओरों को भी कुर्सी चाहिऐ और हमें भी अब कुर्सी चाहिऐ। अब कुर्सी राम जी दिलाऐ या फिर हनुमान जी भला क्या फर्क पडता है।उनकी इस दलील से हम सहमत नहीं थे । भला यह भी कोई बात हुई, जब चाहा राम नाम का जाप शुरू कर दिया और जब चाहा राम जी के नाम को फाइल में बन्द कर अंधेरे कूऐ में लटका दिया...? हमने कहा- भैय्या जी पिछली बार चुनाव में आपके राम जी विदेश यात्रा पर चले गये थे क्या ?उस समय तो किसी को याद ही नहीं आये हमारे आराध्य देव। और अबकी बार फिर एक बार याद आ गई ,लगता है देश की सारी समस्या राम मन्दिर से ही हल हो जाऐगी।भैय्या जी ने मायूस होते हुऐ कहा - पिछली बार राम जी को भूल गये थे तभी तो राम जी ने दंड दिया और कर दिया सत्ता से बाहर ।हम तो वैसे ही बदनाम हैं हिन्दूवादि और कट्टरवादी के नाम से....। तो फिर क्यों न अब खुल कर ही नाम लें राम जी का ।
हमने कहा- फिर तो इस बार मन्दिर बन ही जाऐगा यदि आपकी सरकार बनी तो...?
वे धीरे से बोले -आप लोगों की बस यही आदत तो खराब है ...। बस एक ही बात को खींचते चले जाते हैं। तुम्हें मालूम नहीं भक्तों का क्या कहना है राम से भी बडा राम का नाम होता है।इसलिऐ मन्दिर के पीछे भला आप क्यों पडे हो ? वह तो जब बनेगा बन जाऐग हमारा तो बस यही इरादा है कि इस बहाने कम से कम सभी श्री राम का नाम तो ले लेगें और जनता का क्या है जब तक चुनाव की ढ़्पली बजती रहेगी तब तक उसे भी याद रहता है , बाद भला किसको याद रहेगा कि किसने क्या कहा था........?
लेकिन अब इन नेताओं को भला कौन समझाऐ कि आज जनता जागरुक हो गई है यह किसी की बपोती नहीं जो जब चाहा जैसा चाहा नचा लिया । उलटे सीधे कुछ भी वादे किऐ और ताकत की गोली की तरह से निगल गये। चलो अब पांच साल के लेऐ तो संजीवनी बूटी मिल गई अगली बार फिर कोई नया फण्डा सोचेगें । लोकतन्त्र को अपनी बांदी समझने वालों को अब जनता मौका मिलने पर सबक भी सिखा सकती है । यह बात आज सभी को समझनी ही होगी। ताकि कोई भी राजनैतिक दल क्यों न हो जनता की उपेक्षा कर उसे बेवकूफ नहीं बना सके।
(दैनिक जन जागृति पक्ष में दि० 08/04/09 को प्रकाशित )
डॉ.योगेन्द्र मणि
Monday, 6 April 2009
काले धन की सफेद माया
काले धन की सफेद माया
हमारे नेताऒं का हमेशा एक ही रोना लगा रहता है कि देश के प्रत्येक नागरिक के सर पर भारी कर्जा है ।यहाँ जन नवजात शिशु जन्म लेत है तो कर्जदार बनकर ही पैदा होता है।हालाकि हमारे देश में प्रतिभाऐं बहुत हैं।आजकल तो हमारे बुद्धीप्रकाशों की विदेशों में बहुत माँग भी बड़ रही है फिर भी हमारे देश का कर्ज है कि हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़्ता ही जा रहा है।जानते हैं क्यों..........?
देश की जनता पसीना बहा रही है और नेता के रूप में देश की अर्थव्यस्था में लगी घुन देश को चतट करने में लगी है। मुझे भी इसका आभास नहीं था वह तो भला हो हमारी सद्बुध्दी दायनी श्रीमती का जो उसने अखबार हमारे सामने पटकते हुऐ कहा-ये देखो हमारे नेता महान......?हम चकराऐ,पूछा क्या हुआ भाग्यवान किसी नेता जी को दिल का दौरा पड गया क्या.......?उनका चेहरा वास्तव में देखने लायक था बोली-उन्हें भला क्यॊम दिल का दौरा पडने लगा , अगर पड भी जायेगा तो उनके बाप का भला क्या जाऐगा....? जेब तो जनता की ही कटनी है....? तुम्हें मालूम है विदेशों में कितना काला धन जमा है...?
हमने पूछा- क्यों भाग्यवान विदेशी बैंकों की आडिट करने का काम ले लिया है क्या तुमने.......? वे तपाक से बोली- ५से १४ खरब डालर तक स्विस बैंकों में जमा है यानी लगभग७००खरब रुपये हमारे देश का काला धन विदेशों में पडा धूल चाट रहा है।सुन कर हम भी सन्न रह गये। एक तरफ तो हम कहते हैं कि हमारे देश का बच्चा पैदा होते ही कर्जदार बन जाता है देश की खातिर ,और दूसरी तरफ जनता के भून पसीने का खरबॊं रुपया चन्द कालाबाजार के सरगनाओं के इशारे पर विदेशों में व्यर्थ ही पडा है।
ताज्जुब तो इस बात का होता है कि इस पैसे में अधिकांश हिस्सेदारी संभवतः कुछ तथाकथित नेताओं की भी है।वैसे नतागिरी भि आजकल नोट कमाने का अच्छा माध्यम बन गया है। तभी तो एक एम.एल.ए.भी पाँच साल में ही करोडपति बन जता है। जबकि देखा जाऐ तो वेतन तो उस्का एक शूल के अध्यापक के बराबर ही होता है फिर भी उसके पास नोतों का अम्बार लगता जाता है और उतनी ही वेतन पाने वाला एक आम नागरिक बडी मुशकिल से घर खर्चा चला पाता है।
हमारे वैज्ञानिक भी पता नहीं क्या करते हैं आज तक कॊई ऐसा इंजेक्शन भी नहीं बना सके जिससे राज करने वाले को लोगों में कुर्सी पर बैठने से पहले यदि लगा दिया जाऐ तो स्वतः ही उसमें ईमानदारी के कीटाणु पदा होने लग जाऐं। अब ऐसे सुन्दर सपने की तो हम और आप केवल कल्पना ही कर सकते हैं शेखचिल्ली के हसीन सपनों की तरह.....?
अर्थशास्त्रियों की माने तो हमारे देश पर कुल कर्जा २.२ खरब डालर है। अब यदि काले धन का कुछ हिस्सा मात्र ही यदि भारत में वापस आ जाऐ तो हमारे देश का सारा कर्ज ही चुक जाऐ। और हम दूसरे देशों को ही कर्ज देने लग जाऐ।
मगर भला ऐसा क्यों हो जाऐ.....?जो भी दल सत्ता में आता है ख्वाब जरूर दिखाता है कि हम विदेशों में जमा काला धन वापस लाऐगें मगर कुर्सी की ताजपोशी होते ही जाँच में ही पूरा समय निकल जाता है। अब वे भी करें तो क्या करें आखिर.........।क्योंकि वे भी जानते हैं कि कि कालए धन की गेरफ्त में खुद उनके लोग भी आ सकते हैं इसलिऐ बस टैम पास करते रहो बस..........।
डॉ.योगेन्द्र मणि
Sunday, 5 April 2009
चूहों पर पहरे की तैयारी
चूहों पर पहरे की तैयारी
भैय्या जी आज बडे बेचैन से दिख रहे थे सो हमने उनसे पूछ ही लिया क्या बात है भैय्या जी आज कुछ उदास से लग रहे हो। भैय्या जी ने लम्बी सांस ली और बोले - किसी को चूह काटता है तो दर्द भी होता होगा । हम बोले - भला इसमें कौन सी नई बात है अब चूहा काटे या कुत्ता ,दर्द तो होगा ही ।लेकिन आज तुम्हें भला चूहा कैसे याद आ गया ...।क्या राम नवमी पर गणपती जी ने दर्शन देकर तुम्हें आदेश दे दिया है कि जा बेट चूहों की सेवा करो नहीं तो चूहा तुम्हें काट लेगा....?
भैय्या जी बोले - नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं तो सोच रहा था कि यदि मैं अचानक कहीं रास्ते चलते मर जाऊँ तो मेरी गिनती लावारिस के रूप नहीं होनी चाहिऐ नहीं तो मुझे भी महाराव भीम सिंह अस्पताल के मुर्दाघर में पहँचा दिया जाऐगा । हम चकराऐ-भैय्या जी आज आपको भला लावारिस केई तरह मरने का खयाल अचनक कैसे आया भला....? और उसपर भी चूहा बीच में कहाँ से आगया........?
भय्या जी बोले -तुम्हें नहीं मालूम क्या ,अखबार में लिखा है की महाराव भीम सिंह अस्पताल में बडे-बडे चूहों का आतंक फैला है.....।हमने कहा चूहें भला कहाँ नहीं हैं आजकल,अब वे भी यदि बेचारे अस्पताल में पहुँच गये तो कौनसा पहाड़ टूट गया जो तुम इतनी बात को लम्बा कर रहे हो।
वे बोले -सवाल चूहों का नहीं है । वहाँ के चूहे मुर्दाघर के मुदों को चट कर जाते है। हमारा चौकना स्वाभाविक था बोले- अब चूहे तो चूहें है कुछ तो खाऐगे ही ।तुम्हें मालूम है कई सरकारी दफ्तरों में तो चूहों को फाइलों का आहार मिल जाता है। कुछ दफ्तरॊं में गाय माता का आहार बन जाती है फाइलें ।अब हो सकता है कि चूहा महाराज को आहार के रूप में कुछ मिल नहीं रहा होगा ,। बेचारा कुछ तो खाइगा ही....?
भैय्याजी बोले - इसीलिऐ तो मैं सोचता हूँ कि अपनी अंतिम इच्छा रजिस्टर्ड करवाकर हमेशा अपनी जेब में अपनेसाथ ही रखूं ताकि भगवान न करे कभी अकेले में अपनी बेटरी बन्द हो जाये तो कम से कम कोई मुझे इस विशाल काय अस्पताल में न ले जाये नहीं तो मेरे शरीर का भी ये चूहे कुतर-कुतर कर हुलिया ही बदल देगें।
हम उन्हें यह कैसे समझा सकते थे कि मरने के बाद की चिन्ता भला अभी से ही वे क्यों कर रहे हैं। यूं भी मरने के बाद किसे पता रहेगा कि हमारे शरीर का किसी ने क्या किया। मगर नहीं साहब उन्हें तो अपने मुर्दे की चिन्ता जिन्दा शरीर से भी ज्यादा सता रही थी। बोले-यदि ऊपर वाले के दरबार में मेरा आधा अधूरा शरीर पहूँचेगा तो वह भला कैसे पहिचानेगा कि मैं हि वो हूँ जिसका फरमान उसने भेजा था। ओर गलती से वापस उसने मेरे अधूरे शरीर की पूर्ती के लिऐ किसी और के शरीर को वहाँ बुला लिया तो.......?व्यर्थ में ही मरे साथ किसी ओर के परिवार का भी नुकसान हो जाऐगा।
उनकी चिन्ता भी वाजिब थी।ऊपर वाले के यहाँ बिना नाक कान या बिना आँख के कोई पहुँचेगा तो वास्तव में किसीको भी अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन कोई भला कर भी क्या सकता है।सरकार ने तो जाँच के आदेश दे दिऐ हैं। जो भी होगा देखा जाऐगा फिलहाल तो चूहों का आनन्द ही आनन्द है।
(जन जागृति पक्ष में ०५/०४/०९ को प्रकाशित
डॉ।योगेन्द्र मणि
चूहों पर पहरे की तैयारी
चूहों पर पहरे की तैयारी
भैय्या जी आज बडे बेचैन से दिख रहे थे सो हमने उनसे पूछ ही लिया क्या बात है भैय्या जी आज कुछ उदास से लग रहे हो। भैय्या जी ने लम्बी सांस ली और बोले - किसी को चूह काटता है तो दर्द भी होता होगा । हम बोले - भला इसमें कौन सी नई बात है अब चूहा काटे या कुत्ता ,दर्द तो होगा ही ।लेकिन आज तुम्हें भला चूहा कैसे याद आ गया ...।क्या राम नवमी पर गणपती जी ने दर्शन देकर तुम्हें आदेश दे दिया है कि जा बेट चूहों की सेवा करो नहीं तो चूहा तुम्हें काट लेगा....?
भैय्या जी बोले - नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं तो सोच रहा था कि यदि मैं अचानक कहीं रास्ते चलते मर जाऊँ तो मेरी गिनती लावारिस के रूप नहीं होनी चाहिऐ नहीं तो मुझे भी महाराव भीम सिंह अस्पताल के मुर्दाघर में पहँचा दिया जाऐगा । हम चकराऐ-भैय्या जी आज आपको भला लावारिस केई तरह मरने का खयाल अचनक कैसे आया भला....? और उसपर भी चूहा बीच में कहाँ से आगया........?
भय्या जी बोले -तुम्हें नहीं मालूम क्या ,अखबार में लिखा है की महाराव भीम सिंह अस्पताल में बडे-बडे चूहों का आतंक फैला है.....।हमने कहा चूहें भला कहाँ नहीं हैं आजकल,अब वे भी यदि बेचारे अस्पताल में पहुँच गये तो कौनसा पहाड़ टूट गया जो तुम इतनी बात को लम्बा कर रहे हो।
वे बोले -सवाल चूहों का नहीं है । वहाँ के चूहे मुर्दाघर के मुदों को चट कर जाते है। हमारा चौकना स्वाभाविक था बोले- अब चूहे तो चूहें है कुछ तो खाऐगे ही ।तुम्हें मालूम है कई सरकारी दफ्तरों में तो चूहों को फाइलों का आहार मिल जाता है। कुछ दफ्तरॊं में गाय माता का आहार बन जाती है फाइलें ।अब हो सकता है कि चूहा महाराज को आहार के रूप में कुछ मिल नहीं रहा होगा ,। बेचारा कुछ तो खाइगा ही....?
भैय्याजी बोले - इसीलिऐ तो मैं सोचता हूँ कि अपनी अंतिम इच्छा रजिस्टर्ड करवाकर हमेशा अपनी जेब में अपनेसाथ ही रखूं ताकि भगवान न करे कभी अकेले में अपनी बेटरी बन्द हो जाये तो कम से कम कोई मुझे इस विशाल काय अस्पताल में न ले जाये नहीं तो मेरे शरीर का भी ये चूहे कुतर-कुतर कर हुलिया ही बदल देगें।
हम उन्हें यह कैसे समझा सकते थे कि मरने के बाद की चिन्ता भला अभी से ही वे क्यों कर रहे हैं। यूं भी मरने के बाद किसे पता रहेगा कि हमारे शरीर का किसी ने क्या किया। मगर नहीं साहब उन्हें तो अपने मुर्दे की चिन्ता जिन्दा शरीर से भी ज्यादा सता रही थी। बोले-यदि ऊपर वाले के दरबार में मेरा आधा अधूरा शरीर पहूँचेगा तो वह भला कैसे पहिचानेगा कि मैं हि वो हूँ जिसका फरमान उसने भेजा था। ओर गलती से वापस उसने मेरे अधूरे शरीर की पूर्ती के लिऐ किसी और के शरीर को वहाँ बुला लिया तो.......?व्यर्थ में ही मरे साथ किसी ओर के परिवार का भी नुकसान हो जाऐगा।
उनकी चिन्ता भी वाजिब थी।ऊपर वाले के यहाँ बिना नाक कान या बिना आँख के कोई पहुँचेगा तो वास्तव में किसीको भी अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन कोई भला कर भी क्या सकता है।सरकार ने तो जाँच के आदेश दे दिऐ हैं। जो भी होगा देखा जाऐगा फिलहाल तो चूहों का आनन्द ही आनन्द है।
(जन जागृति पक्ष में ०५/०४/०९ को प्रकाशित
डॉ।योगेन्द्र मणि
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