जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार-पत्र के स्थाई स्तम्भ में प्रकाशित व्यंग्य लेख
Friday, 17 April 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष में प्रकाशित मेरे स्थाई कॉलम से )
दि .17/04/09
// चुनावी मौसम // _______________________________भूल सुधार---------------
चुनावी मौसम में अचानक बदलाव आ गया है। कोटा के पूर्व जिला प्रमुख जिन्होंने पिछले तीस सालों से कमल का दामन थाम रखा था अचानक उन्हें कमल की गंध से एलर्जी हो गई हैऔर कमल से नाता तोड़कर हाथी पर सवारी करने का का विचार बना लिया है।भाजपा से पहलेविधान सभा और अब लोकसभा में उनकी नहीं सुनने पर उन्हें अहसास हो गया है कि भाजपा की नीतियां देश हित में नहीं है। इसलिऐ देशहित को ध्यान में रखकर वेहाथी पर सवारी करने जा रहें है और शुक्रवार को कोटा से उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करेंगे। उन्हें लगता है कि बहिन जी के सानिध्य में वे देशहित कर सकेगें । लगता हैउनके जिलाप्रमुख के कार्यकाल में जो उन्होंने देश का नुकसान किया अब वे उसे सुधारना चाहते हैं। -----------------------------------------------------------------------------------------------------------गूर्जरों को लॉलीपाप______________________
गूर्जरों को पिछली राजस्थान सरकार ने आरक्षण का लॉलीपाप थमा कर बैसला को अपनी गोद में बिठा लियाथा। इसबार हाथी पर सवार बहिन जी ने राजस्थान में प्रवेश करने के लिऐ गुर्जरों की तरफ आरक्षण का नया पैतरा फैका है।लगता है आरक्षण ही एक ऐसा अचूक बाण आजकल नेताओं के पास बचा है जिसके माध्यम से भोली भाली जनता को आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। किसीने सही ही कहा है कि जब तक बेवकूफ बनने वाले मिलते रहेगें बनाने वालों की कमी नहीं आने वाली......।राजस्थान विधान सभा में हालाकि बहिन जी के छः विधायक आ गये थे हाथी पर सवार होकर ,मगर क्या करें कुर्सी के लिऐ हाथी से छलांग लगाकर गहलोत सरकार का हाथ थामने से बहिन जी वापस शून्य पर जा पहुँची..।आखिर बहिन जी भी तो यह सब मात्र कुर्सी के लिऐ ही कर रही हैं....?
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जात सम्भालूं या हाथ.....?__________________________
गरजू लाल जी पिछले विधान सभा चुनाव से पूर्व ही जात- पांत के चक्कर में कमल के साथ से हाथ धो बैठे थे। उन्हें न जाने कैसे भ्रम हो गया कि वे जाति विशेष के नेता बन गये और उनकी जाति के सभी लोग उनके ही पीछे हैं।उन्हें पक्का विश्वास था कि जात और हाथ का सहयोग बना रहा तो निश्चित ही वे कुर्सी पर पुनः विराजमान हो ही जाऐगें।इस भ्रम में ही उन्होंने अपने पुराने क्षेत्र से हाथ का साथ देते हुऐ हाथ के साथ जात के दम पर चुनाव लडा मगर चारों खाने चित...इधर भी और उधर भी....।या कह जाइ कि खुद तो डूबे ही सनम उन्हें भी ले डूबे।अब लोकसभा में उन्हें एक बार फिर उम्मीद थी कि वे उनका साथ देते हुऐ अपनि रेलगाडी में लटका लेंगे ।मगर उन्होंने भी कह दिया कि पहले आप हमारा हाथ थाम कर मजबूती प्रदान करें तो हम भी कुछ सोचेगें.....?मगर इन्हें तो शायद हाथ से ज्यादा जात पर विश्वास था इसीलिऐ आखिर तक लटके रहे कि मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ...?और अन्त में ट्रेन की सारी सीटें ही फुल हो गई। अब वे अपनी किस्मत को कोस रहे है कि हाथ का साथ थाम लेता तो शायद जात का साथ अपने आप ही मिल जाता। मगर अब वे दोष दे रहे हैम उन पर कि उन्होंने हाथ झटक कर हमें तो सडक पर ला दिया.....। यह निर्णय तो उन्हें ही करना था कि उन्हें जात सम्भालनी है या हाथ..............?
डॉ.योगेन्द्र मणि
Thursday, 16 April 2009
चुनावी मौसम
----------------------------------------------------------------------------_लोकसभा चुनाव पर विशेष कालम ‘चुनावी मौसम_’__जन जागृति पक्ष में प्रकाशित दि. 15-04-09 ____________________________________
लंगर का स्वाद
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नामांकन की तारीख घोषित होते ही गडाबडाने लगता है।कभी भरी सर्दी में भी गर्मी का अहसास होने लगता है तो कहीं गर्मी में भी माहोल में ठंडक बनी रहती है।यहाँ तो स्थिति ये है कि सूर्य देव की कृपा से जहाँ सभी को वैसे ही गर्मी का अहसास हो रहा है ,वहीं चुनावी भाषणों और रैलियों से गर्मी बढ़्ती जा रही है। लेकिन ऐसी गर्मी में भी कुर्सी की चाहत भी ऐसीबला है कि लोगों को तपती दोपहरी भी ए.सी. की ठंडक दे रही है।बैसाखी और अम्बेडकर जैयन्ती हर साल कब आती है और कब चली जाती है इसका अहसास कुछ लोगों को तो शायद पहली बार ही हुआ होगा। चलो अच्छा है चुनाव के बहाने ही सही यह तो मालूम ही हो गया कि बैसाखी और अम्बेडकर जैयन्ति भी हमारे देश में मनाई जाती है। तभी तो महाराजा साहब हों या इंजीनियर साहब सभी पहुँच गये लावा-लश्कर के साथ गुरुद्वारे में मथ्था टेकने।इस बहाने दरबार में हाजरी भी हो गई और साथ ही लंगर का स्वाद भी चख लिया......।अब यह भी एक संयोग ही था कि दोनों बडे दलों के उम्मीदवार एक ही साथ गुरुग्रंथ साहिब के दरबार में हाजरी लगाने पहुँचे थे जिससे इन्हें भी एक दूसरे को हाय हेलो कहने का मौका तो मिल गया\ दोनों ने एक दूसरे से अपने लिऐ वोट माँगी या नहीं मैं नहीं कह सकता लेकिन इतना तय है कि दोनों ही मन ही मन यह जरूर सोच रहे होंगे कि ये कहाँ से आ टपके इस समय.....? अब इन लोगों से कोई पूछे ले कि अब से पहले भल कौन-कौन कितनी बार गया यहाँ पर मथ्था टेकने.....और लंगर चखनेतो सभी शायद बगलें झाकने लगें.....?वैसे भी इन्हें लंगर वंगर से भला क्या लेना देना....? इस बहाने मुफ्त में भीड मिल गई और अपना भी प्रचार हो गया बस......... और भला किसी को क्या चाहिऐ इस चुनावी मौसम में किसी भी उम्मीदवार को........?
डॉ.योगेन्द्र मणि
डॉ. किरोडी ने रंग दिखाया
डॉ. किरोडी ने रंग दिखाया
राजस्थान सरकार में मन्त्री रहे डॉ. किरोडी लाल मीणा जो कभी भाजपा के वरिष्ठ नेता कहलाते थे और अब विधान सभा चुनाव से पूर्व भाजपा छोड़ कर निर्दलीय चुनाव लडकर विधायक है और कॉग्रेस सरकार के सहयोगी है, ने आखिर अपना रंग दिखा ही दिया ।जब से चुनाव प्रक्रिया प्रारम्भ हुई है तभी से निर्दलीय विधायक मीणा राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत को लोकसभा सीटॊं के बटवारे के नाम पर ब्लेक मेल करने में लगे थे। उनकी मंशा थी कि पाँच से दस सीटों पर उनकी मर्जी से मीणा उम्मीदवारों को वे खडा करें । मगर गहलोत की राजनीती के सामने उनकी गोटियां फेल हो गई। निर्दलीय विधयक डॉ मीणा का विचार था कि वे विधान सभा की निर्दलीय सीट पर बने रहकर ही कॉग्रेस उनके लिऐ दौसा की सीट छोड दे और वे वहाँ से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। लेकिन मुख्य मन्त्री अशोक गहलोत की रणनीति के चलते डॉ किरोडी चारों खाने चित हो गये क्योंकि जिन मीणा बल पर उन्हें गुरूर था वे सभी कॉग्रेस में शामिल हो गये। राजस्थान विधान सभा की 200 सीटों में से सत्ताधारी कॉग्रेस के पास केवल 96 सीटें ही थी । डॉ. किरोडी ने सरकार को समर्थन के बदले स्वयं की पत्नी गोलमा देवी को राज्य मन्त्री भी बनवा दिया था । लेकिन अब गहलोत ने 6 बसपा विधायकों को कॉग्रेस में शामिल कर बहुमत के लिऐ आवश्यक 101 का जादुई आंकडा छू लिया है और उसे अब किसी के समर्थन की आवश्यकता नहीं है। ज्ञात रहे सार्वजनिक रूप सेडॉ. किरोडी हमेशा ही चुनाव नहीं लडने और कॉग्रेस को समर्थन की बात कहते रहे हैं साथ ही अंदरूनी तौर पर कॉग्रेस पर यह दबाव डालते रहे हैं कि वह लोक सभा की 25 में से 24 पर ही चुनाव लडे और एक सीट स्वयं डॉ. किरोडी के लिऐ छोडे़ । लेकिन मुख्यमन्त्री गहलोत के टारगेट 25 के सामने उनकी एक नहीं चली और अंततः डॉ .मीणा को अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से कहनी ही पड़ी कि वे अब निर्दलीय चुनाव लडेगें।अपनी पत्नी गोलमा द्वारा मन्त्री मंडल से त्याग-पत्र दिलाने का हथियार भी आखिर फेल ही रहा।
(दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे स्थाई कालम में 15-04-09 को प्रकाशित)
Wednesday, 15 April 2009
जाऐं तो जाऐं कहाँ
बड़ी इंतजार,चिन्तन मनन और खींचतान के बाद आखिर कोटा लोकसभा के लिऐ पूर्व महाराजा के पुत्र इज्यराज सिंह को भाजपा का अनुसरण करते हुऐ, भाजपा की ही तरह सीधे ही पैराशूट से चुनावी मैदान में उतार दिया गया।
कॉग्रेसी यह कह कर सीना फुला सकते हैं कि हमने केवल पार्टी के सदस्य को ही चुनावी मैदान में उतारा है। भले ही वह दो दिन पूर्व सदस्य बना हो लेकिन सदस्य तो आखिर सदस्य ही है। दो दिन पहले का हो या दो घण्टे पहले का।
अब भाजपा ने तो टिकिट दे कर सदस्यता दिलवाइ है।
पार्टी के आला कमान ने कहा था कि हम पार्टी के सदस्य को ही टिकिट देगें सो उन्होंने अपना वादा पूरा किया ।कुछ लोग जो दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते थे उनके दिल के अरमान आंसुओं में ही बह गऐ लगता है।अब डॉ. किरोडी हों या प्रहलाद गूंजल दोनों के ही मंसूबे घरे रह गये और सारी चतुराई पर गहलोत की जादुगिरी से पानी फिर गया।
एक ओर जहाँ किरोडी जी अपने हाथ में डोर लेकेर कॉग्रेस को नचाना चाह रहे थे,वहीं दूसरी ओर गुंजल भी टिकिट फोकट में ही बिना पार्टी की सदस्यता के ही चाह रहे थे।सभी ने बहुत समझाया कि भैय्या जी जब टिकिट लेना ही है तो भला पर्टी की सदस्यता लेने में भला कैसी शर्म.....? पर नहीं साहब हमरा दिल तो भाजपा में अटका है...? क्या पता कब अपने पुराने संगी -साथियों को हमारी याद सताने लगे.....?बस यही सोचकर लटके रहे बेचारे.......।
डॉ. साहब को भी यह भ्रम सताने लगा था कि सरकार की डोर तो हमारे ही हाथ में है जब चाहेगें हिलाया, और सरकार हो जाऐगी धराशाई। लेकिन गहलोत भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेले हैं उन्होंने तो वह डाल ही काट डाली जिसपर बैठकर वे शिकर खेलना चाहते थे।बसपा के कुल जमा छः विधायक ही कॉग्रेस की झोली में जा बैठे।और डॉ. साहब मुँह देखते ही रह गऐ......।
कुर्सी के लिऐ लोग न जाने क्या- क्या कर जाते हैं अब बसपा विधायकों ने यदि कुर्सी के लिऐ डॉ. साहब को यदि ठेंगा दिखा भी दिया तो भला कौनसा पहाड़ टूट गया। इन्होंने भी तो कुर्सी के लिऐ ही भाजपा क दामन छोडा था......।दूसरी तरफ गुंजल साहब भी अपनी गूजर वोटों की थैली जेब में लिऐ घूमते रह गऐ।लेकिन गहलोत जी थे कि पार्टी की सदस्यता वालों को ही टिकिट दिलाने पर अडे थे।आखिर उनका टारगेट 25 का अभियन जो था। अब यह अभियान कहाँ तक सफल होता है यह तो वक्त ही बतायेगा। फिलहाल तो दोनों हथों में लड्डू रखने वालों के मंसूबों पर पानी फिर ही गया।
अब जिनका मन भटक रहा हो कहीं ओर, कुर्सी का सपना दिख रहा हो कहीं ओर ।ऐसे लोगों का कोई कर भी क्या सकता है।इनके हालात से न तो ये पिघले और न ही वे....?कुल मिलकर अभी तो न घर के रहे न घाट के.....?
(दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे स्थाई कॉलम में 15-04-09 को प्रकाशित )
डॉ.योगेन्द्र मणि
Saturday, 11 April 2009
जूता फैंक प्रतियोगिता शुरू
जूता फैंक प्रतियोगिता शुरू
आजकल एक महारोग छूत के रोग की तरह फैलता हुआ प्रतीत हो रहा है। जिस तेजी से इसका प्रसार हो रहा है उसे देखकर सोचने पर मजबूर होना पडता है कि आखिर क्या होगा इस देश का......?वैसे तो हमारे देश की जनता हर विदेशी उत्पादन की बडी खूबसूरती से नकल कर लेती है ऐसा प्रायः सुना जाता है। कई बार तो नकल ही असल से ज्यादा असली लगती है। अब चाहे वह इलेक्ट्रोनि आइटम हो या अन्य घरेलू सामान। सभी मामलों में नकल में हमारा कोई मुकाबला नहीं है ।
हमारे वैज्ञानिकों का लोहा अमेरिका जैसा देश भी मानने लगा है ।
लेकिन आजकल बिना सोचे समझे हर अच्छी बुरी बात की नकल करना भला कहाँ की अकलमंदी है।इस मामले मे कोई माने या न माने हमारी श्रीमती जी का दिमाग सुपरफास्ट ट्रेन की तरह दौड़ता है। आज सुबह ही हमारे जूतों की कहानी क्या पढ़ी, कि हो गई राशन पानी लेकर चालू.। बोली- तुम काहे को अच्छे भले प्रजातंत्र की प्रजा को बिगाडने पर तुले हो ....?
हम हैरान -भाग्यवान यह आप क्या कह रही हैं । सभी कहते हैं कि हम जनता को राह दिखाने का काम करते हैं और आप हैं कि उलटा हमें ही दोष दे रही हैं कि हम जनता को बिगाड़ रहे हैं....।
वे फौरन बोली ओर नहीं तो क्या अमेरीका के बुश पर हो या भारत के गृह मन्त्री पर जूता फैंक कार्यक्रम भला किसने प्रारम्भ किया....? पत्रकारों ने ही न....? तो अब भुगतने के लिऐ तैयार रहो....। देश में जूता फैंक प्रतियोगिता प्रारम्भ हो गई है । आज एक भूतपूर्व अध्यापक ने आपका अनुसरण किया है एक सांसद पर जूता फैंक कर....। हम बड़बड़ाऐ -भागयवान जरा धीरे बोलो पड़ोसी सुनेगें तो क्या सोचेगें जैसे सचमुच हमने ही जूता फैंक प्रतियोगिता आयोजित करवा रखी हो। मैं तो किसी पर फूल तक फैंकने से घबराता हूँ और तुम हो कि सीधे ही मेरा नाम ले रही हो ...।वे तपाक से बोली - मेरा मतलब तुम्हारी पत्रकार बिरादरी से है।रास्ता तो उन्होंने ही दिखाया है तभी तो आज फिर जूता फैंका गया । आज जूते का शिकार एक सांसद को होना पड़ा...? क्या यही हमारी सभ्याता है...?
वास्तव में श्रीमती जी की बात तो सही है। और वो भी सोलह आने.....। विरोध जताने का भला यह कौनसा तरीका हुआ...और वह भी पढ़े लिखे सभ्य कहलाने वाले लोगॊं के द्वारा.......।ऐसा लगने लगा है जैसे जूता फैंक प्रतियोगिता हो रही है कि किसका निशाना कितना सही लगे....?
प्रश्न अब यह उठता है कि आखिर ऐसी स्थितिया पैदा ही कैसे हो गई जो आज जनता के प्रतिनिधी कहलाने वाले लोगों को जनता का आक्रोश इस तरह सहना पड़ रहा है। कथित प्रतिनिधी कहलाने वाले लोगों को सही मायने में जन प्रतिनिधी बनना होगा वरना एक समय ऐसा आयेगा कि ऐसे हादसे बढ़्ते जाऐगे और आप और हम एक दूसरे का मूँह देखते ही रह जाऐगें।
(जन जागृति पक्ष में मेरे स्थाई कॉलम में 11-04-09 को प्रकाशित)
डॉ. योगेन्द्र मणि
Friday, 10 April 2009
एक के साथ एक जोडी जूता फ्री
एक के साथ एक जोड़ी जूता फ्री
कल शाम को हमने सोचा कि चलो आज नये जूते ही खरीद लिऐ जाऐ। कई दिनों से हमारे एक पैर का पंजा जूते से बाहर निकलने की नाकाम कोशिश कर रहा था। हम जूते वाले की दुकान में पहुँचे और सस्ता, मजबूत टिकाऊ सा जूता दिखाने के लिऐ कहा तो उसने हमें पहले तो ऊपर नीचे तक निहारा फिर बोला-आप वही हैं न जो अखबार में फोटो के साथ रोजाना छपते हैं ।
हम मन ही मन गद्-गद हो गये चलो इतने बडे शहर में कोई तो मिला जो हमें पहिचानता है।वरना श्रीमती जी तो हमेशा कहती रहती हैं कि दिन भर कलम घसीटने से भला क्या फायदा...? अब हम उनसे कह सकते हैं कि कलम घसीटन से ही आज इतने बडे शहर में जूते वाला तक हमें पहिचनता है। हमनें उससे बडी आत्मीयता से पूछा-लगता है आप मेरा लिखा रोजाना पढ़ते हैं ?वह बडी शराफत से बोला _ पढ़ना कहाँ हो पाता है साहब...अब हम आपकी तरह निठल्ले तो हैं नहीं .....? दिन भर काम से ही फुरसत नहीं मिल पाती वो तो आपकी फोटो भी छपती है इसलिऐ पहिचान लिया ।शाम को आपकी फो्टो वाला अखबार जूतो की पेकिंग में ही काम आता है।
हमने जान पहिचान बढ़ाने की छोड़कर जुते दिखाने का आग्रह किया तो वह बोला- कितने जूते चाहिये आपको....? हमने कहा -कितने क्या एक जोडी जूते लेने हैं, अब एक बार में एक ही जोड़ी पहिन सकेगे....? दुकानदर ने सिर खुजलाते हुऐ कहा - तो आपको जूते पहिनने के लिऐ चाहिऐ...?
हम चकराऐ- श्रीमान जी जूते पैरों में पहिनने के लिऐ ही होते हैं उन्हें गले में तो लटकाया नहीं जा सकता ? वह तुरन्त बोला- बुरा मत मानियेगा साहब आजकल आपकी बिरादरी में जूता फैक प्रतियोगिता जो चल रही है, बस इसीलिऐ पूछ लिया था मैनें तो ।आगे आपकी मरजी है आप जूते गले में गले में लटकाऐं या फिर किसी नेता के ऊपर फैकें..?
हम बोले- आखिर आप कहना क्या चाहते हैं..?दुकानदार ने हमें समझाते हुऐ कहा-देखिऐ श्रीमान जी पहले अमेरिका के राष्ट्रपति पर आपकी ही बिरादरी के व्यक्ति ने जूता फैका था अब उसीका अनुसरण करते हुऐ यहाँ भी एक पत्रकार ने मन्त्री जी पर जूता फैक दिया इसीलिऐ मैंने आपसे पूछ था कि कहीं आपको भी फैकने के लिऐ जूते चाहिऐं क्या......?मेरे पास बहुत सा डेड स्टोक पड़ा है। यदि आपकी महरबानी हो जाऐ तो अपने मित्रों को भी हमारी दुकान का पता बताना ,आपको स्पेशल डिस्काउन्ट मिल जाऐगा.....एक जोड़ी फैकने वाले के जूतों के साथ पहिनने के जूते मुफ्त.....!
अब हम भी भला क्या जबाब देते उसके इस ऑफर का...?हमने फिलहाल जूते पहिनने का अपना कार्यक्रम स्थगित किया और चुपचाप वहाँ से बाहर निकल लेना ही उचित समझा ।अब ऐसे सिर फिरे लोगों का कोई कर भी क्या सकाता है जो कलम हाथ में लेकर जूते से अपनी बात समझान चाहते हैं........?
( दैनिक जन जागृति पक्ष में 10-04-09 को प्रकाशित )
डॉ. योगेन्द्र मणि
Thursday, 9 April 2009
जय हो के भय हो से कै हो
जय हो के भय हो से कै हो
हमारे देश से जब कोई विदेश जाकर वापस आ जाता है तो उसका मान सम्मान ,आदर सत्कार कुछ ज्यादा ही होने लगता है। हमारी सोच , उस व्यक्ति के प्रति बदल जाती है।क्योंकि फोरन रिटर्न का तमगा जो लग जाता है सीने पर....।लगता है हीरे की पहिचान केवल विदेशी लोगों को ही होती है। तभी तो फोरन का ठप्पा लगा नहीं कि लगे सभी उसके पीछे दौडने......!कुछ दिनों पहले टी.वी. पर शोर था, जय हो ...जय हो.......विदेश में एवार्ड मिला था जय हो को....सभी आँख बन्द कर दौड़ पड़े....जय हो के पीछे....।एक पार्टी ने तो बाकायदा ‘जय हो’ को रजिस्टर्ड भी करा लिया है। लेकिन कल तो गजब हो गया जुम्मन चाचा की जुबान पर जय हो की तर्ज पर नये ही शब्द थे। वे गुनगुना रहे थे भय हो.....भय हो........। हमने जुम्मन चाचा को समझाया -भला यह कौन सा नया सुर अलाप रहे हो.....भय हो.....भय हो......। सही गाना भय हो नहीं जय हो है.. जब गाने का शोक ही पाल रहे हो तो जरा ठीक से पालो और सही गाओ।जुम्मन चाचा हमारा मुँह ताकने लगे ,बोले -आप भी क्या गजब करते है।जय हो तो हाथ वाली पार्टी का है हमारा तो भय हो, ही है ।वे जय हो रजिस्टर्ड करा सकते हैं तो हम भी किसीसे कम थोड़ा ही हैं हम भय हो गायेगें।हमने पूछा -जुम्मन चाचा ‘भय’ भला किससे.....जनता से...कॉग्रेस से या फिर आपकी पार्टी से......? या फिर गुलजार साहब के जय हो से......? तभी हमें एक दूसरा ही स्वर कै हो....कै हो.....सुनाई दिया। हमने देखा कि भैय्या जी मस्ती में गाते हुऐ आरहे है....कै हो कै हो......। हमने भैय्या जी को स्वर पर ब्रेक लगाने को कहते हुऐ पूछा - भैय्या जी क्यों अच्छे भले गाने का बन्टाढ़ार करने पर तुले हो.......? तुम्हें कै नहीं हो रही तो क्यों चिल्ला रहे हो कि कै हो ...कै हो.....? लोग तो कै बन्द करने की दवा लेते हैं और तुम हो कि स्वर में गा -गा कर कह रहे हो- कै हो ....कै हो.......? कुछ उलटा सीधा तो नहीं खा लिया था कहीं...?(राजस्थान में कै ,उलटी होना या वमन को कहते हैं),लेकिन उन्होंने हमें बतया कि जय हो कि तरह ही एक पर्टी का यह भी चुनावी गीत है --कै हो.. कै हो....।बडी अजीब बात है सभी एक ही गाने के पीछे पडे है...आखिर विदेशों ने इस गीत को एवार्ड से जो नवाज गया है। गुलजर को ऑस्कर मिला है तो इन्हें लगता है कि गीत जरूर लकी है जिसके कारण ए.आर .रहमान कॊ भी ऑस्कर मिल गया। अब रहमान को गुलजार के कारण ऑस्कर मिला या गुलजार को रहमान के कारण....इसपर बहस बाद में फिलहाल तो सबको ऐसा लगता है कि इस धुन से ही उन्हें लोकसभा में बहुमत जरूर मिल जाऐगा...........?अब यह तो वक्त ही बताऐगा कि जय हो से किसको भय लगता है और किसको कै होती है और किसकी कै बन्द होती है...........?
(दैनिक जन जागृति पक्ष में 09-04-09 को प्रकाशित)
डॉ.योगेन्द्र मणि
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