जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार-पत्र के स्थाई स्तम्भ में प्रकाशित व्यंग्य लेख
Tuesday, 21 April 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष के मेरे कॉलम से,दि.21/04/09)
कब तक रूंठे रहोगे......? _______________________________________________________________
गुर्जरों के आरक्षण के नाम पर तात्कालिक सरकारी पक्ष के विधायक होते हुऐ भी अपनी ही सरकार से पंगा लेने के अपराध में हाडोती का यह पूर्व नेता अभी तक भी वनवास ही भुगत रहा है ।सोचा था कि अब तो हम पक्के राष्ट्रीय नेता हो गये है । आन्दोलन के कारण अच्छा नाम भी हो गया है लेकिन गत विधान सभा चुनाव में निर्दलीय लडकर शायद उन्हें आभास होने लगा था कि किसी न किसी पार्टी का साथ या हाथ बहुत जरूरी है अब चाहे वहकिसी का भी हाथ हो।लेकिन भला यह क्या हाथ वालों ने हाथ ही नहीं थामा..........?ऐसे में महरानी जी ने समझदारी दिखाते हुऐ इनका दरवाजा खटखटाया है और कमल के साथ वापस घर बुलाया है।हाडोती के वरिष्ठ जनों के साथ उनके दरवाजे पर जाकर मनुहार की है कि आखिर कब तक रूंठे रहोगे.........? घर का मामला है घर -घर में बर्तन बजते हैं लौट भी आओ........?अब भूलो कल की बातें कल की बात पुरानी....। अब जिससे झगडा शुरु हुआ था जब वही दरवाजे पर आ गया तो भला कैसी नाराजगी.......?इसी को तो कहते हैं राजनीति......जहाँ राज के लिऐ सभी नीतियों को ताक पर रख दिया जाता है ......क्योंकि अपना तो ध्येय ही मात्र कुर्सी पकड नीति रह गया है । समाज और जनता का क्या इसकी तो याद्दाश्त ही कमजोर होती है। थोडे दिनों बद ही सब भूल जाऐगी......? _______________________________________________________________
पुत्र मोह में........! _______________________________________________________________________________________________________________
हाडोती की झालावड़-बॉरा संसदीय सीट पर इस बार कुछ ज्यादा ही निगाहें लोगॊं की लगी हैं । बीस वर्षों से इस सीट पर अपना प्रभुत्व जमाऐ रखने के बावजूद महारानी जी की नींद हराम हो गई है ।और वह भी एक अनजान महिला के नाम से......?भले ही उम्मीदवार नया है लेकिन माता श्री का पुत्र मोह है कि जरा सा भी रिस्क लेने के मूड में वे नहीं है। भला लें भी क्यों .......?सामने खडी महिला उम्मीदवार राजस्थान सरकार मे मंन्त्री जी की धर्म पत्नी जो हैं कहते हैं कि बॉरा जिले की चारों विधान सभा सीटें अपनी जेब में जो रख रखी हैं......।तभी तो अपने पुत्र को एक बार फिर सांसद की कुर्सी तक पहुँचाने के लिऐ दृढ़ संकल्प मातृ प्रेम ,बार -बार घूम फिर कर झालावाड-बॉरा पहुँच ही जाता है। कभी किसी रूंठे को मनाया जा रहा है तो कभी विरोधियों को अपने साथ जोडा जा रहा है.....। क्योंकि यहाँ से सांसद भले ही उनका पुत्र हो लेकिन जनता वोट तो उन्हें ही देती है। इसलिऐ इस सीट सॆ हार भी उनकी तो जीत भी उन्हीं की ही होगी.......।
Monday, 20 April 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे कॉलम से दि.20/04/09)
राजा भी प्रजा के दरबार में _____________________________________________________________________________________________________________हमारे देश में लोकतन्त्र की नैया पार लगाने के लिऐ चुनावी मौसम का आगमन हो चुका है । जैसे -जैसे चुनाव में खडे होने वाले उम्मीदवारो का लेखा जोखा सामने आ रहा है वैसे-वैसे हमारी आँखें भी चुंधियाने लगी हैं।हर कोई जन सेवक करोडों का मालिक है और सभी को गरीबों की चिन्ता है।जनता की सेवा के लिऐ हर खास-ओ- आम से लेकर राजघराने तक के लोग लाइन में लगें हैं।जिनके दर्शनों के लिऐ लोग तरसते थे वे आज जनता के सामने याचक बन कर कर खडे हैं।यह एक अलग बात है कि चुनाव जीतनें के बाद ये ही जनसेवक ईद के चाँद की तरह बडी मुशकिल से नजर आते हैं । मगर फिर भी आज जब भी कोई राजघराने का व्यक्ति स्वयं चलकर प्रजा के सामने खडा होता है तो प्रजा तो वैसे ही धन्य हो जाती है ।अब यह अलग बात है कि प्रजा की यह आत्मीयता वोट में कहाँ तक तब्दील हो पाती है। क्योंकि यह जनता है भैय्या सब जानती है, तभी तो भरत में लोकतन्त्र जिन्दा है.....। ______________________________________________________________________________________________________________
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ _______________________________________________________________________________________________________________
मीणा समाज के हमदर्द बनने के लिऐ जी जान से जुटे कुछ लोग अभी भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं है कि उन्हें करना क्या है......?एक तरफ सत्ताधरी पार्टी को समर्थन दिया जा रहा है तो दूसरी ओर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उसीके खिलाफ चुनाव के मैदान में ताल ठोक कर खडे हैं ।साथ ही सत्तधारी दल के अध्यक्ष के लिऐ चुनाव प्रचार का एलान भी कर रहें हैं । उनका कहना है कि सी. पी जोशी तो अच्छे इंसान हैं तो भला बुरा आदमी इस राजनीति में कौन मिलेगा सभी एक से एक आला दर्जे के भलमानुष ही तो आते हैं राजनीति मैं। हाँ यह अलग बात है कि लोगों का आंकलन करते समय हमारा नजरिया जरुर समय समय पर ,अपनी सुविधा के अनुसार बदलता रहता है।तभी तो किरोडी जी दोनों हाथ में लड्डू रखने के चक्कर में कभी उनकी प्रशंसा करते हैं तो कभी कोसना शुरू कर देते हैं।शायद अकेले में वे गुनगुनाते होंगे कि मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं बडी मुशकिल पडी है किधर जाऊं............?क्योंकि भले ही उन्होंने निर्दलीय पर्चा भर दिया हो लेकिन गहलोत साहब ने भी अभी आस नहीं छोडी है तभी तो अभी तक दरवाजे खुले हैं आखिर किरोडी जी एक अच्छे आदमी हैं........। _______________________________________________________________________________________________________________
प्यार की झप्पीऔर पप्पी __________________________________________________________________________________________________________
मुन्नाभाई यानि संजय दत्त साहब चुनावी भाषण में प्यार की झप्पी के साथ बहिन जी के लिऐ प्यार की पप्पी देने का ऐलान क्या किया कि प्रताप गढ़ के डीएम का नोटिस जारी हो गया कि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है आप न तो प्यार की झप्पी देगें और न ही पप्पी.....? मुन्ना भाई सोचते होगें कि भला यह कैसा संहिता का चक्कर है तैश में कुछ बोलो तो भडकाऊ भाषण का डर प्यार से बोलो तो भी डर आखिर वे बेचारे करें भी तो क्या करें इससे अच्छे तो वे फिल्मों में ही थे ।वहां जब जिसे चाहा झप्पी दो जब मन चाहा पप्पी दो .... कोई झन्झट ही नहीं है किसी भी तरह का.............?अब इस झप्पी-पप्पी का जबाब किस भाषा में देना है इसके लिऐ किसी भले आदमी से ही सलाह लेनी होगी क्योंकि अभी तो पहले के केस ही नहीं सुलझ रहे है और राह चलते अमर सिंह के चक्कर में अब एक केस ओर गले पड जाऐगा.....?
राजा भी प्रजा के दरबार में _____________________________________________________________________________________________________________हमारे देश में लोकतन्त्र की नैया पारलगाने के लिऐ चुनावी मौसम का आगमन हो चुका है । जैसे -जैसे चुनाव में खडे होने वाले उम्मीदवारो का लेखा जोखा सामने आ रहा है वैसे-वैसे हमारी आँखें भी चुंधियाने लगी हैं।हर कोई जन सेवक करोडों का मालिक है और सभी को गरीबों की चिन्ता है।जनता की सेवा के लिऐ हर खास-ओ- आम से लेकर राजघराने तक के लोग लाइन में लगें हैं।जिनके दर्शनों के लिऐ लोग तरसते थे वे आज जनता के सामने याचक बन कर कर खडे हैं।यह एक अलग बात है कि चुनाव जीतनें के बाद ये ही जनसेवक ईद के चाँद की तरह बडी मुशकिल से नजर आते हैं । मगर फिर भी आज जब भी कोई राजघराने का व्यक्ति स्वयं चलकर प्रजा के सामने खडा होता है तो प्रजा तो वैसे ही धन्य हो जाती है ।अब यह अलग बात है कि प्रजा की यह आत्मीयता वोट में कहाँ तक तब्दील हो पाती है। क्योंकि यह जनता है भैय्या सब जानती है, तभी तो में लोकतन्त्र जिन्दा है.....। ______________________________________________________________________________________________________________मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ _______________________________________________________________________________________________________________
मीणा समाज के हमदर्द बनने के लिऐ जी जान से जुटे कुछ लोग अभी भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं है कि उन्हें करना क्या है......?एक तरफ सत्ताधरी पार्टी को समर्थन दिया जा रहा है तो दूसरी ओर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उसीके खिलाफ चुनाव के मैदान में ताल ठोक कर खडे हैं ।साथ ही सत्तधारी दल के अध्यक्ष के लिऐ चुनाव प्रचार का एलान भी कर रहें हैं । उनका कहना है कि सी. पी जोशी तो अच्छे इंसान हैं तो भला बुरा आदमी इस राजनीति में कौन मिलेगा सभी एक से एक आला दर्जे के भलमानुस ही तो आते हैं राजनीति मैं। हाँ यह अलग बात है कि लोगों का आंकलन करते समय हमारा नजरिया जरुर समय समय पर ,अपनी सुविधा के अनुसार बदलता रहता है।तभी तो किरोडी जी दोनों हाथ में लड्डू रखने के चक्कर में कभी उनकी प्रशंसा करते हैं तो कभी कोसना शुरू कर देते हैं।शायद अकेले में वे गुनगुनाते होंगे कि मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं बडी मुशकिल पडी है किधर जाऊं............?क्योंकि भले ही उन्होंने निर्दलीय पर्चा भर दिया हो लेकिन गहलोत साहब ने भी अभी आस नहीं छोडी है तभी तो अभी तक दरवाजे खुले हैं आखिर किरोडी जी एक अच्छे आदमी हैं........। _______________________________________________________________________________________________________________प्यार की झप्पीऔर पप्पी __________________________________________________________________________________________________________मुन्नाभाई यानि संजय दत्त साहब चुनावी भाषण में प्यार की झप्पी के साथ बहिन जी के लिऐ प्यार की पप्पी देने का ऐलान क्या किया कि प्रता्पगढ के डीएम का नोटिस जारी हो गया कि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है आप न तो प्यार की झप्पी देगें और न ही पप्पी.....? मुन्ना भाई सोचते होगें कि भला यह कैसा संहिता का चक्कर है तैश में कुछ बोलो तो भडकाऊ भाषण का डर प्यार से बोलो तो भी डर आखिर वे बेचारे करें भी तो क्या करें इससे अच्छे तो वे फिल्मों में ही थे ।वहां जब जिसे चाहा झप्पी दो जब मन चाहा पप्पी दो .... कोई झन्झट ही नहीं है किसी भी तरह का.............?अब इस झप्पी-पप्पी का जबाब किस भाषा में देना है इसके लिऐ किसी भले आदमी से ही सलाह लेनी होगी क्योंकि अभी तो पहले के केस ही नहीं सुलझ रहे है और राह चलतेअम्र सिंह के चक्कर में अब एक केस ओर गले पड जाऐगा.....?
Sunday, 19 April 2009
रंगत चुनाव की
दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे कॉलम से दि. 18/04/09
रंगत चुनाव की
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बैसला का फैंसला
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राजस्थान के गुर्जरों को आरक्षण की आग में धकेलने वाले आज स्वयंभजपा के नेता बन बैठे है।जिस भाजपा सरकार के राज में दर्जनों गुर्जर गोलियों से भून दिये गये और कर्नल बैसला के नेतृत्व में हजारों लोग,गुर्जरों की लाशों की नुमाइश लगाये बैठे रहे ,सूखी रोटियां खा-कर पानी पी पी कर बैसला जी जिन्हें कोसते रहे।अब वे उसी कमल की ठंडी छांव में लोकसभा का चुनाव लड़ेगें। क्योंकि भाजपा ने कर्नल बैसला कोसवाईमाघोपुर-टोंक से टिकिट दिया है।लगता है बैसला साहब जुर्जर आन्दोलन में मरे दर्जनों शवों की गन्ध लोकसभा की हसीन कुर्सी के आगे भुला चुके हैं।तभी तो कल जिनसे गुर्जरों के खून का हिसाब मांगा जा रहा था आज उन्हीं के कन्धे से कन्धा मिलाकर साथ खडे होने में ये गौरवान्वित हो रहे हैं।उनकी नेतागिरी का राज लोगों को अब समझ में आया कि वे बार-बार महारानी जी के दरबार में समझोते की जाजम बिछाने के लिऐ क्यों जाते थे। धन्य कुर्सी मैय्या....बाप बड़ा न मैय्या सबसे बड़ी कुर्सी मैय्या....? _____________________________________________________________________________________________________________
मामा कंस ______________________________________________________________________________________________________________
डॉ.किरोड़ी लाल आखिर न न करते हुऐ निर्दलीय ही चुनावी समर में उतर ही गाऐ।कॉग्रेस ने उन्हें अपना हाथ नहीं थामाया तो अब बेचारे करते भी क्या.....?वे तो न घर के रहे न घाट के ..। उन्होंने सोचा था कि कॉग्रेस की दशा ऐसी हो जाऐ कि वे उनपर निर्भर रहें लेकिन हो गया उल्टा ही.....।कल जॊ उनके साथ थे आज वे गहलोत का हाथ थामें हैं आखिर कुर्सी का सवाल है....?अब भला मामा परसादी लाल भी भला क्यों पीछे रहते ,उन्होंने भी डॉ. साहब का साथ छोड़ दिया तो डॉ. साहब ने उन्हें मामा कंस की उपाधी से जा नवाजा है।क्योंकि राजस्थान सरकार में मन्त्री परसादी लाल मीण डॉ. किरोडी के मामा भी हैं। अब मामा ,भानजे की हिफाजत नहीं कर पाऐगा तो कंस मामा ही तो कहलाऐगा......। हो सकता है उनकी बात भी सही हो क्यॊंकिकंस मामा ने भी तो अपनी कुर्सी की सुरक्षा के लिऐ ही सारे हथकंडे अपनाऐ थे और ये भी अपनी कुर्सी कि सुरक्षा के लिऐ ही सब कुछ कर रहे हैं।कुर्सी सुरक्षा में भला बुराई भी क्या है....?कहने वाले अब कंस कहें या कुछ और भला क्या फर्क पडता है......। ______________________________________________________________________________________________________________
करोंड़ों के जन सेवक _______________________________________________________________
अजब है पर सच है कि आम आदमी का पूरा जीवन ही होम हो जाता है तब भी करोड़ क्या लाख रुपये कैसे होते हैं बस कल्पना ही करता रह्ता है ।कभी बीबी की फटी साडी की चिन्ता तो कभी बच्चों के स्कूल की फीस की....!लेकिन हमारे जनसेवकों को पास न जाने कौनसा जादू आता है कि पाँच साल में ही उनकी सम्पत्ती चोगुनी और दस गुनी तक हो जाती है। जबकि उनके वेतन का हिसाब लगाया जाऐ तो कहीं से भी गणित ठीक नहीं बैठता।ओर तो ओर करोडों की सम्पत्ती जमा करके भी किसी के पास घर नहीं तो किसी के पास वाहन नहीं है बेचारे न जाने कैसे गुजर करते है। प्यारी जनता के प्यार में उन्हें खुद के छप्पर तक की चिन्ता नहीं है।क्या ही अच्छा हो यदि ये लोग आम जनता को भी धन को पंख लगाने का कोई फार्मूला बता दें तो मेरे देश का हर गरीब लखपति और करोडपति हो जाऐ.और मिनटों में ही विदेशी कर्ज तक उतर जाये......?
Friday, 17 April 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष में प्रकाशित मेरे स्थाई कॉलम से )
दि .17/04/09
// चुनावी मौसम // _______________________________भूल सुधार---------------
चुनावी मौसम में अचानक बदलाव आ गया है। कोटा के पूर्व जिला प्रमुख जिन्होंने पिछले तीस सालों से कमल का दामन थाम रखा था अचानक उन्हें कमल की गंध से एलर्जी हो गई हैऔर कमल से नाता तोड़कर हाथी पर सवारी करने का का विचार बना लिया है।भाजपा से पहलेविधान सभा और अब लोकसभा में उनकी नहीं सुनने पर उन्हें अहसास हो गया है कि भाजपा की नीतियां देश हित में नहीं है। इसलिऐ देशहित को ध्यान में रखकर वेहाथी पर सवारी करने जा रहें है और शुक्रवार को कोटा से उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करेंगे। उन्हें लगता है कि बहिन जी के सानिध्य में वे देशहित कर सकेगें । लगता हैउनके जिलाप्रमुख के कार्यकाल में जो उन्होंने देश का नुकसान किया अब वे उसे सुधारना चाहते हैं। -----------------------------------------------------------------------------------------------------------गूर्जरों को लॉलीपाप______________________
गूर्जरों को पिछली राजस्थान सरकार ने आरक्षण का लॉलीपाप थमा कर बैसला को अपनी गोद में बिठा लियाथा। इसबार हाथी पर सवार बहिन जी ने राजस्थान में प्रवेश करने के लिऐ गुर्जरों की तरफ आरक्षण का नया पैतरा फैका है।लगता है आरक्षण ही एक ऐसा अचूक बाण आजकल नेताओं के पास बचा है जिसके माध्यम से भोली भाली जनता को आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। किसीने सही ही कहा है कि जब तक बेवकूफ बनने वाले मिलते रहेगें बनाने वालों की कमी नहीं आने वाली......।राजस्थान विधान सभा में हालाकि बहिन जी के छः विधायक आ गये थे हाथी पर सवार होकर ,मगर क्या करें कुर्सी के लिऐ हाथी से छलांग लगाकर गहलोत सरकार का हाथ थामने से बहिन जी वापस शून्य पर जा पहुँची..।आखिर बहिन जी भी तो यह सब मात्र कुर्सी के लिऐ ही कर रही हैं....?
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जात सम्भालूं या हाथ.....?__________________________
गरजू लाल जी पिछले विधान सभा चुनाव से पूर्व ही जात- पांत के चक्कर में कमल के साथ से हाथ धो बैठे थे। उन्हें न जाने कैसे भ्रम हो गया कि वे जाति विशेष के नेता बन गये और उनकी जाति के सभी लोग उनके ही पीछे हैं।उन्हें पक्का विश्वास था कि जात और हाथ का सहयोग बना रहा तो निश्चित ही वे कुर्सी पर पुनः विराजमान हो ही जाऐगें।इस भ्रम में ही उन्होंने अपने पुराने क्षेत्र से हाथ का साथ देते हुऐ हाथ के साथ जात के दम पर चुनाव लडा मगर चारों खाने चित...इधर भी और उधर भी....।या कह जाइ कि खुद तो डूबे ही सनम उन्हें भी ले डूबे।अब लोकसभा में उन्हें एक बार फिर उम्मीद थी कि वे उनका साथ देते हुऐ अपनि रेलगाडी में लटका लेंगे ।मगर उन्होंने भी कह दिया कि पहले आप हमारा हाथ थाम कर मजबूती प्रदान करें तो हम भी कुछ सोचेगें.....?मगर इन्हें तो शायद हाथ से ज्यादा जात पर विश्वास था इसीलिऐ आखिर तक लटके रहे कि मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ...?और अन्त में ट्रेन की सारी सीटें ही फुल हो गई। अब वे अपनी किस्मत को कोस रहे है कि हाथ का साथ थाम लेता तो शायद जात का साथ अपने आप ही मिल जाता। मगर अब वे दोष दे रहे हैम उन पर कि उन्होंने हाथ झटक कर हमें तो सडक पर ला दिया.....। यह निर्णय तो उन्हें ही करना था कि उन्हें जात सम्भालनी है या हाथ..............?
डॉ.योगेन्द्र मणि
Thursday, 16 April 2009
चुनावी मौसम
----------------------------------------------------------------------------_लोकसभा चुनाव पर विशेष कालम ‘चुनावी मौसम_’__जन जागृति पक्ष में प्रकाशित दि. 15-04-09 ____________________________________
लंगर का स्वाद
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नामांकन की तारीख घोषित होते ही गडाबडाने लगता है।कभी भरी सर्दी में भी गर्मी का अहसास होने लगता है तो कहीं गर्मी में भी माहोल में ठंडक बनी रहती है।यहाँ तो स्थिति ये है कि सूर्य देव की कृपा से जहाँ सभी को वैसे ही गर्मी का अहसास हो रहा है ,वहीं चुनावी भाषणों और रैलियों से गर्मी बढ़्ती जा रही है। लेकिन ऐसी गर्मी में भी कुर्सी की चाहत भी ऐसीबला है कि लोगों को तपती दोपहरी भी ए.सी. की ठंडक दे रही है।बैसाखी और अम्बेडकर जैयन्ती हर साल कब आती है और कब चली जाती है इसका अहसास कुछ लोगों को तो शायद पहली बार ही हुआ होगा। चलो अच्छा है चुनाव के बहाने ही सही यह तो मालूम ही हो गया कि बैसाखी और अम्बेडकर जैयन्ति भी हमारे देश में मनाई जाती है। तभी तो महाराजा साहब हों या इंजीनियर साहब सभी पहुँच गये लावा-लश्कर के साथ गुरुद्वारे में मथ्था टेकने।इस बहाने दरबार में हाजरी भी हो गई और साथ ही लंगर का स्वाद भी चख लिया......।अब यह भी एक संयोग ही था कि दोनों बडे दलों के उम्मीदवार एक ही साथ गुरुग्रंथ साहिब के दरबार में हाजरी लगाने पहुँचे थे जिससे इन्हें भी एक दूसरे को हाय हेलो कहने का मौका तो मिल गया\ दोनों ने एक दूसरे से अपने लिऐ वोट माँगी या नहीं मैं नहीं कह सकता लेकिन इतना तय है कि दोनों ही मन ही मन यह जरूर सोच रहे होंगे कि ये कहाँ से आ टपके इस समय.....? अब इन लोगों से कोई पूछे ले कि अब से पहले भल कौन-कौन कितनी बार गया यहाँ पर मथ्था टेकने.....और लंगर चखनेतो सभी शायद बगलें झाकने लगें.....?वैसे भी इन्हें लंगर वंगर से भला क्या लेना देना....? इस बहाने मुफ्त में भीड मिल गई और अपना भी प्रचार हो गया बस......... और भला किसी को क्या चाहिऐ इस चुनावी मौसम में किसी भी उम्मीदवार को........?
डॉ.योगेन्द्र मणि
डॉ. किरोडी ने रंग दिखाया
डॉ. किरोडी ने रंग दिखाया
राजस्थान सरकार में मन्त्री रहे डॉ. किरोडी लाल मीणा जो कभी भाजपा के वरिष्ठ नेता कहलाते थे और अब विधान सभा चुनाव से पूर्व भाजपा छोड़ कर निर्दलीय चुनाव लडकर विधायक है और कॉग्रेस सरकार के सहयोगी है, ने आखिर अपना रंग दिखा ही दिया ।जब से चुनाव प्रक्रिया प्रारम्भ हुई है तभी से निर्दलीय विधायक मीणा राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत को लोकसभा सीटॊं के बटवारे के नाम पर ब्लेक मेल करने में लगे थे। उनकी मंशा थी कि पाँच से दस सीटों पर उनकी मर्जी से मीणा उम्मीदवारों को वे खडा करें । मगर गहलोत की राजनीती के सामने उनकी गोटियां फेल हो गई। निर्दलीय विधयक डॉ मीणा का विचार था कि वे विधान सभा की निर्दलीय सीट पर बने रहकर ही कॉग्रेस उनके लिऐ दौसा की सीट छोड दे और वे वहाँ से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। लेकिन मुख्य मन्त्री अशोक गहलोत की रणनीति के चलते डॉ किरोडी चारों खाने चित हो गये क्योंकि जिन मीणा बल पर उन्हें गुरूर था वे सभी कॉग्रेस में शामिल हो गये। राजस्थान विधान सभा की 200 सीटों में से सत्ताधारी कॉग्रेस के पास केवल 96 सीटें ही थी । डॉ. किरोडी ने सरकार को समर्थन के बदले स्वयं की पत्नी गोलमा देवी को राज्य मन्त्री भी बनवा दिया था । लेकिन अब गहलोत ने 6 बसपा विधायकों को कॉग्रेस में शामिल कर बहुमत के लिऐ आवश्यक 101 का जादुई आंकडा छू लिया है और उसे अब किसी के समर्थन की आवश्यकता नहीं है। ज्ञात रहे सार्वजनिक रूप सेडॉ. किरोडी हमेशा ही चुनाव नहीं लडने और कॉग्रेस को समर्थन की बात कहते रहे हैं साथ ही अंदरूनी तौर पर कॉग्रेस पर यह दबाव डालते रहे हैं कि वह लोक सभा की 25 में से 24 पर ही चुनाव लडे और एक सीट स्वयं डॉ. किरोडी के लिऐ छोडे़ । लेकिन मुख्यमन्त्री गहलोत के टारगेट 25 के सामने उनकी एक नहीं चली और अंततः डॉ .मीणा को अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से कहनी ही पड़ी कि वे अब निर्दलीय चुनाव लडेगें।अपनी पत्नी गोलमा द्वारा मन्त्री मंडल से त्याग-पत्र दिलाने का हथियार भी आखिर फेल ही रहा।
(दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे स्थाई कालम में 15-04-09 को प्रकाशित)
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