जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार-पत्र के स्थाई स्तम्भ में प्रकाशित व्यंग्य लेख
Friday, 24 April 2009
चुनावी हलचल
वसुन्धरा का झालावाड में डेरा
राजस्थान विधान सभा में काग्रेस पार्टी की सरकार बनने के बाद काग्रेस जनों में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है। और राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशो्क गहलोत लोक सभा चुनाव में टारगेट 25 लेकर चल रहें है । यहाँ से लोकसभा की पच्चीस सीटे हैं। दूसरी ओर भाजपा की पूर्व मुख्य मन्त्री वसुन्धरा राजे और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष माथुर पिछली बार लोकसभा की कुल 21 सीटों को बरकरार रखने पर ध्यान दे रहे हैं।
मगर इस बार स्थिति बसुन्धरा राजे के लिऐ थोडा विकट बनी हुई है।वे चुनाव प्रचार में अपने पुत्र की सीट झालावाड -बॉरा पर ही अटकी हुई हैं उन्हें प्रदेश के अन्य क्षेत्र देखने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। जब से काग्रेस की तरफ से उर्मिला जैन को उम्मीदवार घोषित किय गया है तभी से वसुन्धरा की नींद हराम हो गई है हाँलाकि उर्मिला नई उम्मीदवार है और पहली बार ही चुनाव लड रही है। लेकिन उनके पक्ष में सबसे मुख्य बात यह है कि झालवाड उनका ननिहल है और बॉरा उनका ससुराल है। साथ ही साथ बारा के ही प्रमोद जैन जो कि राजस्थान सरकार में सार्वजनिक निर्माण मन्त्री हैं ,उनके पति भी है,उनका बॉरा क्षेत्र में अच्छा प्रभाव है।गत विधान सभा में चारों सीटो पर, प्रमोद जैन के ही प्रयासों से काग्रेस ने कब्जा किया था। इसका प्रभाव लोकसभा में भी निश्चित ही पडेगा । इसी डर के कारण वसुन्धरा ने झालावाड-बॉरा में ही डेरा डाल रखा है।प्रमोद जैन की साफ-सुथरी छवि का फयदा कॉग्रेस को मिलेगा ही ऐसे अनुमान अभी से ही लगाऐ जा रहे हैं।
झालावाड की सीट पिछले बीस वर्षो से पहले वसुन्धरा और अब उनके पुत्र दुष्यन्त सिंह के पास है। इस बार दुष्यन्त सिंह के् सामने मैदान में उर्मिला का आना पूर्व मुख्य मन्त्री को बैचेन करने का मुख्य कारण रहा है ।
इस सीट पर बेटे को विजय दिलाने के लिऐ एक माँ सब कुछ करने को तैयार है। पिछले दिनों विधनसभा चुनाव के समय या उसके पहले आपसी मन मुटाव के कारण जिन लोगॊं को भाजपा ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था उन सभी को मनाने का सिलसिला जारी है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो कि बसुन्धरा राजे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते थे क्योंकि गुर्जर आन्दोलन के समय उनके बीच की खाइयां इतनी बढ चुकी थी जिससे लगता था कि अब इनका नजदीक आना नामुनकिन है । लेकिन सभी बातों को भुलाकर वे इन नेताओं के घर जाकर स्वयं पार्टी में वापस ला रही हैं।ताकि जहाँ से भी थोडा बहुत सहारा मिल सके ले लिया जाऐ और किसी भी तरह बेटे को विजयी बनाना ही उनका अन्तिम लक्ष्य बनता जा रहा है। और इसमें राज्य पर घ्यान देना सम्भव नहीं हो पा रहा है।
परिणाम क्या होगा यह तो समय ही बताऐगा लेकिन इतना तय है कि इस क्षेत्र से जीत या हार दोनों ही वसुन्धरा की व्यक्तिगत जीत हार ही होगी। क्योंकि उनके पुत्र दुष्यन्त सिंह का इस जीत या हार में कोई विशेष हाथ नहीं होगा । भाजपा को यहाँ से वोट केवल वसुन्धरा के नाम पर ही मिलेगें न कि दुष्यन्त सिंह के नाम पर ।गत पाँच वर्षों में यहाँ के लोग इन्हें केवल महारानी साहिबा के पुत्र के रूप में जानते हैं।
डॉ. योगेन्द्र मणि
महारानी जी घर आई हो राम जी
(दैनिक जन्जागृति पक्ष के मेरे कॉलम से दि.24/04/09 )
महारानी जी घर आई हो राम जी
मेडम रूठे हुऐ नेता जी को मनाने उनके घर पहुँचीतो नेता जी का पूरा परिवार ही मेडम के स्वागत के लिऐ तैयार था। मालाऐं पहिनाई गई ,छाछ पिलाई, मिठाई भी खिलाई। सभी प्रसन्न.....। खास तौर से नेता जी और मेडम यानि कि महारानी जी.....।सभी की बाँछे खिली थी।प्रसन्नता होनी भी चाहिऐ....राजस्थान की महान हस्ति जो पधारी थी, नेता जी को वापस घर बुलाने के लिऐ और उनका साथ माँगने के लिऐ......? घर के सदस्यों की खुशी से ऐसा लग रहा था जैसे हर कोई गुनगुना रहा हो -महारानी जी घर आई हो राम जी.......! एसे में जुम्मन चाचा ने चाय की चुस्की लेते हुऐ भैय्या जी को छेडते हुऐ कहा-कल तक महारानी जी को पानी पी-पीकर कोसने वाले नेताजी अचानक महारानी जी की शरण में कैसे आ गये...? भैय्या जी तपाक से बॊले-नेता जी महारानी जी की शरण में नहीं आऐ हैं वो तो स्वयं ही आई थी नेता जी के द्वार पर....।जुम्मन चाचा बोले-बात तो एक ही हुई....ये गये या वो आई, क्या फर्क पडता है........? --फर्क कैसे नहीं पडता है....? अभी जरूरत तो उन्हीं को है न अपने बेटे के लिऐ......और पार्टी की साख बचाऐ रखने के लिऐ ।नेता जी का क्या वे तो आराम से बैठे थे.......? _भैय्या जी हकीकत तो ये है कि जरूरत तो नेता जी को भी थी.....। उन्हें तो जमीन पर पैर रखने की भी जगह नहीं दिख रही थी। वह तो किस्मत अच्छी थी जो वे ही आगे होकर आ गई।वरना कॉग्रेस ने तो आयना दिखा ही दिया था......। ऐन समय पर उन्हें चोराहे पर लाकर खडा कर दिया....आखिर जाते भी तो कहाँ जाते नेता जी .....? --आप भी जुम्मन चाचा क्या बात करते हो ....हमारे नेता जी आखिर गुर्जर समाज के नेता हैं । -शायद समाज की उसी नेतागिरी को भुनाने की कोशिश में लगे थे नेताजी.......! तभी तो समाज के नाम पर हीरो बने एक नेता जी ने तो पहले ही भाजपा से टिकिट ले ही लिया अब ये भी कुछ पुरुस्कार पाने की उम्मीद में वापस आ गये शायद......? इन्हें लगता है कि इनके समाज की याद्दास्त बहुत कमजोर है शायद इसीलिऐ आरक्षण के नाम पर सैंकडों नारियों की मांग से सिन्दूर पौछने वालों के ही साथ आज ये वापस कन्धे से कन्धा मिलाकर खडे हैं।उन विधवाओं का सामना करने में इनके पैर नहीं डगमगाऐगें क्या......? --जुम्मन चाचा ये राजनीति है इसमें काहे की शर्म......!हमारे नेता जी ने तो कह दिया है कि राजनीति में कोई व्यक्तिगत दुश्मन नहीं होता.....।अब तुम अपने ही घर को ले लो पिछले साल जब तुम्हारा बेटा तुमसे नाराज होकर चला गया था घर से निकल कर ,तब तुम भी उसे मना कर वापस घर लेकर आये थे कि नहीं......?अब पार्टी भी तो इनका घर ही है उन्होंने मनाया और ये मान गये बस बात खत्म......!काहे को जरा सी बात को लम्बी किये जा रहे हो तुम भी......? वैसे बात भी सही हैवे रूंठे मनाये हमें क्या लेकिन जो बच्चे इनकी राजनैतिक रोटियों के चक्कर में अनाथ हो गये.......जिनका सुहाग उजड गया......जिन बहिनों के हाथ की राखियां हमेशा के लिऐ उनके हाथों में ही रह गई उनक भला इनकी राजनीति से क्या लेना देना था....?इन सब सवालों का जबाब तो इन्हें देना ही चाहिऐ.....?
डॉ. योगेन्द्र मणि
Thursday, 23 April 2009
रंगत चुनाव की
( दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे कॉलम से दि.२३/०४/०९ )
जूते-चप्पल प्रूफ पिंजरा ले लो......!
अबकी बार लोकसभा चुनाव मेंजुते- चप्पल से खडाऊँ तक चल गई । कब किस पर कौन कहाँ किस ब्राण्ड से वार कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता। छोटा नेता हो या बडा ,सभी इस अनचाही जूतों की बहार से बचाव के जुगाड में लगे हैं। क्योंकि अभी तो बहुत सी सभाओं में भाषण देना है......। लगता है अब तो सभी को अपना गुस्सा जाहिर करने का सस्ता मजबूत तरीका हाथ लग गया है। धन्य हो वह प्रथम पत्रकार जिसने अमेरीका के प्रथम नागरिक पर इस नवीन अश्त्र का प्रयोग कर जूते जैसी नाचीज वस्तु को भी रातों रात दुनिया भर में चमकाया......। यह अश्त्र ओर कहीं यह चला हो या नहीं भारत में तो चल ही निकला....विशेष कर चुनावों में.......। लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं ने इससे बचाव का रास्ता निकालकर अपने प्रिय नेता की सुरक्षा के लिऐ मन्च पर लोहे की जालिया लगा दी हैं । अब देखते हैं कि किसीकि चप्पल या जूता हमारे नेता तक पहूँचता है।हमारे भैय्या जी ने तो भाषण देने के लिऐ मन्च के आकार के लोहे की जाली युक्त जूता चप्पल प्रूफ पिंजरों के उत्पादन की योजना बनाई है, यदि सरकार उन्हें कभी न लौटाने वाला ऋण किसी बैंक से दिला दे तो...........क्योंकि चुनाव से पहले जो वसूली हो जाऐगी तो ठीक नहीं तो बाद में सब डूबेग ही......?अभी तो वे फिलहाल कुछ पार्टियों से संपर्क कर रहे है।मुझे तो लगता है भैय्या जी का प्लान आगे बढे उससे पहले गलियों में आवाजे आने लगेगीं -भाषण के पिंजरे बनवालो.....जुते-चप्पल प्रूफ पिंजरे ले लो............ दो पिंजरों के साथ एक फ्री ले लो............? _____________________________________________________________________________________________________________
चुनावीभडास
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एक तो मौसम की गर्मी, ऊपर से नेताओं के एक दूसरे पर टाइम पास आरोपों का पिटारा है कि रोजाना कुछ न कुछ नए संवाद सुनाई देते रहते हैं....।अब केवल चुनाव का ही तो समय मिलता है इन्हें भी अपनी -अपनी भडास निकालने का.....?क्योकि जब सांसद या मन्त्री रहते हैं तो संसद मे प्रश्न पूछने की फुरसत ही नहीं रहती नेताजी को...।वैसे हकीकत तो ये है कि अधिकांश सांसद तो केवल घर बैठे ही वेतन भत्ते जेब में रखते रहते हैं वे भला किसी से क्या प्रश्न करेगें।कुछ तो ऐसे भी हैं सरकार के भले ही सहयागी हैं मन्त्री हैं मगर चुनाव में उनकी ढ़पली अलग ही बज रही है। जिनकी महरबानी से कुर्सी पर हैं उन्हीं के लिऐ शब्दों की मनमर्जी की जुगाली करना नेतागिरी का शायद मुख्य सिद्धान्त रहा होगा.......?लेकिन चुनाव के बाद ये ही नेता सभी का वजन तोलेगें, फिर से नई समीकरण बनाने की राह खोजेगें और जिनकी अभी टांग खिचाई करते नहीं थकते हैं,मौका देखकर उन्हीं की गोद में जा बैठेगें। क्योकि कुर्सी मैय्या जब सामने बाहें पसारे खडी होती है तो अच्छॆ-अच्छे नेता भी पिघल जाते हैं क्या करें ,मजबूरी है। सारी उठापटक इस कुर्सी के लिऐ ही तो हो रही है अब भला कोई कुर्सी से मुँह कैसे मोड सकता है........।कुर्सी मिली नहीं कि सारे गिले-शिकवे दूर.....?
Wednesday, 22 April 2009
कोई लो्टा दे मेरे बीते हुऐ दिन
कोई लौटा दे मेरे बीते हुऐ दिन..... ..... !
हमारे देशमें कुछ लोग कुर्सियों के लिऐ बने होते हैं या कुर्सियां इन लोगों के लिऐ होती हैं ।यह बात आजतक मेरी समझ से बाहर है।जब भी किसी चुनाव का समय नजदीक आता है तो ये कुर्सी पकड नेता अपनी-अपनी जुगाड में लग जाते हैं कि कहां और कैसे सेटिंग करके कुर्सी सुरक्षित की जा सकती है। क्योंकि कुर्सियां सीमित हैं और इसके आशिक अनेक .....। हर वर्ष इसके चाहने वालों में इजाफा हो जाता हैं भला क्यों न हो.....?कुर्सी सुख जिसने एक बार भोग लिया उसे बिना इसके नींद नहीं आती और जो दौड में है उसे इसकी चाहत में नींद नहीं आती।और वह भी राजनीति में सांसद या विधायक की कुर्सी.....। एक बार किसी तरह कुर्सी कब्जे में आ जाऐ बस....फिर क्या है आगे का इंतजाम तो अपने आप ही हो जाता है।हमारे देश में ऐसे -ऐसे नेता नामक जीव हैं जो भले ही कब्र में पैर लटकाऐ हैं लेकिन फिर भी बस एक बार और की रट लगाऐ ही रहते हैं।ऐसे -ऐसे कुर्सी पकड मौजूद हैं जो सरकारी खर्च की आक्सीजन पर गुजर कर रहें हैं लेकिन चुनावी मौसम का आगाज हुआ नहीं कि फिर से तैयार हो जाऐगें चुनावी समर में दो-दो हाथ आजमाने....। कुछ तो यहाँ तक अपनी पर उतर आते हैं कि पार्टी मे टिकिट नहीं दिया तो क्या हुआ निर्दलीय ही सही चुनाव तो आखिर लडना ही है....?कोई अपनी औलाद के लिऐ जुगाड में लगा है तो कोई घरवाली को राजनीति के दलदल में ला खडा करने पर आमादा है, ताकि कहीं से ही सही एक बार राजनीति में आने के बाद तो बस उनकी पैतृक सम्पत्ति ही मानो इस कुर्सी ही हो ......\हमारे दादा परदादा वसी्यत के नाम पर खेत ,खलिहान, घर आदि छोड कर जाते थे लेकिन आज कल हमारे देश के करर्णधार अपनी वसीयत में शांसद या विधायक की कुर्सी भी छोड्कर जाने लगे हैं। टिकिटों के बटवारे के बाद जब किसी कुर्सी पकड का नाम लिस्ट में नहीं होता है तो उसक चेहरा सू्खे आम की तरह लटका हुआ मिलेगा। जिस दल ने उन्हें चालीस- पचास सालों तक ढोया है अब उसीमें हजारों कमिया नजर आने लागती हैं। हमने बडे सहज भाव से विदेशी डॉक्टरों की दवाइयों पर भारत सरकार की ऑक्सीजन के सहारे दिन काट रहे एक नेता जी को गलती से सलाह दे दी-अब तो पीछा छोड दीजिऐ बेचारी इस कुर्सी का...बर्षों से आपका बोझा ढोते-ढोते इस बेचारी कुर्सी की भी सांस फूलने लग गई होगी आपकी तरह.....? वे तपाक से बोले- क्या बात कर रहें हैं आप भी...इस कुर्सी के लिऐ तो मैं सब कुछ कुर्बान कर दूँ।कुर्सी है तो जहान है ,बाकी सब सुनसान है।हम तो वैसे भी जन सेवक हैं हमें तो स्वयं के स्वास्थ्य से अधिक देश की चिन्ता रहती है।बरसों तक हमने पार्टी और देश की सेवा की है अब बुढापे में ज्यादा नहीं बस इतना ही चाहते हैं कि हमें न सही हमारी किसी औलाद को ही हमारी सेवा के बोनस के तौर पर एक अदद टिकिट ही कहीं से मिल जाता। हमने कहा-महाराज आप कुर्सी छोडेगें तो दूसरों को भी मौका मिलेगा इस्लिऐ अच्छा हो कि आप सम्मान से रिटायर्मेंट ले लें....।इस्पर वे हमें घूरते हुऐ बोले-यदि हमने रिटायरमेंट ले लिया तो इस देश का क्या होगा कभी सोचा है आपने.....?हमें हमारी चिन्ता नहीं एस देश की चिन्ता है हमारे देश को मेरे जैसे मंजे हुऐ नेताओं की जरूरत है। अभी तो हमें अपने पुत्र-पुत्रियों को भी तो सेट करना है ताकि वे भी देश की सेवा कर सकें..........?हमें तो लगता है ये कुर्सी पकड नेता जी उपर वाले के यहाँ पहुँचने पर भी कुर्सी को ही याद करते रहेगें । और गुनगुनाऐगें कोई लौटादे मेरे बीते हुऐ दिन.....॥
Tuesday, 21 April 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष के मेरे कॉलम से,दि.21/04/09)
कब तक रूंठे रहोगे......? _______________________________________________________________
गुर्जरों के आरक्षण के नाम पर तात्कालिक सरकारी पक्ष के विधायक होते हुऐ भी अपनी ही सरकार से पंगा लेने के अपराध में हाडोती का यह पूर्व नेता अभी तक भी वनवास ही भुगत रहा है ।सोचा था कि अब तो हम पक्के राष्ट्रीय नेता हो गये है । आन्दोलन के कारण अच्छा नाम भी हो गया है लेकिन गत विधान सभा चुनाव में निर्दलीय लडकर शायद उन्हें आभास होने लगा था कि किसी न किसी पार्टी का साथ या हाथ बहुत जरूरी है अब चाहे वहकिसी का भी हाथ हो।लेकिन भला यह क्या हाथ वालों ने हाथ ही नहीं थामा..........?ऐसे में महरानी जी ने समझदारी दिखाते हुऐ इनका दरवाजा खटखटाया है और कमल के साथ वापस घर बुलाया है।हाडोती के वरिष्ठ जनों के साथ उनके दरवाजे पर जाकर मनुहार की है कि आखिर कब तक रूंठे रहोगे.........? घर का मामला है घर -घर में बर्तन बजते हैं लौट भी आओ........?अब भूलो कल की बातें कल की बात पुरानी....। अब जिससे झगडा शुरु हुआ था जब वही दरवाजे पर आ गया तो भला कैसी नाराजगी.......?इसी को तो कहते हैं राजनीति......जहाँ राज के लिऐ सभी नीतियों को ताक पर रख दिया जाता है ......क्योंकि अपना तो ध्येय ही मात्र कुर्सी पकड नीति रह गया है । समाज और जनता का क्या इसकी तो याद्दाश्त ही कमजोर होती है। थोडे दिनों बद ही सब भूल जाऐगी......? _______________________________________________________________
पुत्र मोह में........! _______________________________________________________________________________________________________________
हाडोती की झालावड़-बॉरा संसदीय सीट पर इस बार कुछ ज्यादा ही निगाहें लोगॊं की लगी हैं । बीस वर्षों से इस सीट पर अपना प्रभुत्व जमाऐ रखने के बावजूद महारानी जी की नींद हराम हो गई है ।और वह भी एक अनजान महिला के नाम से......?भले ही उम्मीदवार नया है लेकिन माता श्री का पुत्र मोह है कि जरा सा भी रिस्क लेने के मूड में वे नहीं है। भला लें भी क्यों .......?सामने खडी महिला उम्मीदवार राजस्थान सरकार मे मंन्त्री जी की धर्म पत्नी जो हैं कहते हैं कि बॉरा जिले की चारों विधान सभा सीटें अपनी जेब में जो रख रखी हैं......।तभी तो अपने पुत्र को एक बार फिर सांसद की कुर्सी तक पहुँचाने के लिऐ दृढ़ संकल्प मातृ प्रेम ,बार -बार घूम फिर कर झालावाड-बॉरा पहुँच ही जाता है। कभी किसी रूंठे को मनाया जा रहा है तो कभी विरोधियों को अपने साथ जोडा जा रहा है.....। क्योंकि यहाँ से सांसद भले ही उनका पुत्र हो लेकिन जनता वोट तो उन्हें ही देती है। इसलिऐ इस सीट सॆ हार भी उनकी तो जीत भी उन्हीं की ही होगी.......।
Monday, 20 April 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे कॉलम से दि.20/04/09)
राजा भी प्रजा के दरबार में _____________________________________________________________________________________________________________हमारे देश में लोकतन्त्र की नैया पार लगाने के लिऐ चुनावी मौसम का आगमन हो चुका है । जैसे -जैसे चुनाव में खडे होने वाले उम्मीदवारो का लेखा जोखा सामने आ रहा है वैसे-वैसे हमारी आँखें भी चुंधियाने लगी हैं।हर कोई जन सेवक करोडों का मालिक है और सभी को गरीबों की चिन्ता है।जनता की सेवा के लिऐ हर खास-ओ- आम से लेकर राजघराने तक के लोग लाइन में लगें हैं।जिनके दर्शनों के लिऐ लोग तरसते थे वे आज जनता के सामने याचक बन कर कर खडे हैं।यह एक अलग बात है कि चुनाव जीतनें के बाद ये ही जनसेवक ईद के चाँद की तरह बडी मुशकिल से नजर आते हैं । मगर फिर भी आज जब भी कोई राजघराने का व्यक्ति स्वयं चलकर प्रजा के सामने खडा होता है तो प्रजा तो वैसे ही धन्य हो जाती है ।अब यह अलग बात है कि प्रजा की यह आत्मीयता वोट में कहाँ तक तब्दील हो पाती है। क्योंकि यह जनता है भैय्या सब जानती है, तभी तो भरत में लोकतन्त्र जिन्दा है.....। ______________________________________________________________________________________________________________
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ _______________________________________________________________________________________________________________
मीणा समाज के हमदर्द बनने के लिऐ जी जान से जुटे कुछ लोग अभी भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं है कि उन्हें करना क्या है......?एक तरफ सत्ताधरी पार्टी को समर्थन दिया जा रहा है तो दूसरी ओर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उसीके खिलाफ चुनाव के मैदान में ताल ठोक कर खडे हैं ।साथ ही सत्तधारी दल के अध्यक्ष के लिऐ चुनाव प्रचार का एलान भी कर रहें हैं । उनका कहना है कि सी. पी जोशी तो अच्छे इंसान हैं तो भला बुरा आदमी इस राजनीति में कौन मिलेगा सभी एक से एक आला दर्जे के भलमानुष ही तो आते हैं राजनीति मैं। हाँ यह अलग बात है कि लोगों का आंकलन करते समय हमारा नजरिया जरुर समय समय पर ,अपनी सुविधा के अनुसार बदलता रहता है।तभी तो किरोडी जी दोनों हाथ में लड्डू रखने के चक्कर में कभी उनकी प्रशंसा करते हैं तो कभी कोसना शुरू कर देते हैं।शायद अकेले में वे गुनगुनाते होंगे कि मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं बडी मुशकिल पडी है किधर जाऊं............?क्योंकि भले ही उन्होंने निर्दलीय पर्चा भर दिया हो लेकिन गहलोत साहब ने भी अभी आस नहीं छोडी है तभी तो अभी तक दरवाजे खुले हैं आखिर किरोडी जी एक अच्छे आदमी हैं........। _______________________________________________________________________________________________________________
प्यार की झप्पीऔर पप्पी __________________________________________________________________________________________________________
मुन्नाभाई यानि संजय दत्त साहब चुनावी भाषण में प्यार की झप्पी के साथ बहिन जी के लिऐ प्यार की पप्पी देने का ऐलान क्या किया कि प्रताप गढ़ के डीएम का नोटिस जारी हो गया कि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है आप न तो प्यार की झप्पी देगें और न ही पप्पी.....? मुन्ना भाई सोचते होगें कि भला यह कैसा संहिता का चक्कर है तैश में कुछ बोलो तो भडकाऊ भाषण का डर प्यार से बोलो तो भी डर आखिर वे बेचारे करें भी तो क्या करें इससे अच्छे तो वे फिल्मों में ही थे ।वहां जब जिसे चाहा झप्पी दो जब मन चाहा पप्पी दो .... कोई झन्झट ही नहीं है किसी भी तरह का.............?अब इस झप्पी-पप्पी का जबाब किस भाषा में देना है इसके लिऐ किसी भले आदमी से ही सलाह लेनी होगी क्योंकि अभी तो पहले के केस ही नहीं सुलझ रहे है और राह चलते अमर सिंह के चक्कर में अब एक केस ओर गले पड जाऐगा.....?
राजा भी प्रजा के दरबार में _____________________________________________________________________________________________________________हमारे देश में लोकतन्त्र की नैया पारलगाने के लिऐ चुनावी मौसम का आगमन हो चुका है । जैसे -जैसे चुनाव में खडे होने वाले उम्मीदवारो का लेखा जोखा सामने आ रहा है वैसे-वैसे हमारी आँखें भी चुंधियाने लगी हैं।हर कोई जन सेवक करोडों का मालिक है और सभी को गरीबों की चिन्ता है।जनता की सेवा के लिऐ हर खास-ओ- आम से लेकर राजघराने तक के लोग लाइन में लगें हैं।जिनके दर्शनों के लिऐ लोग तरसते थे वे आज जनता के सामने याचक बन कर कर खडे हैं।यह एक अलग बात है कि चुनाव जीतनें के बाद ये ही जनसेवक ईद के चाँद की तरह बडी मुशकिल से नजर आते हैं । मगर फिर भी आज जब भी कोई राजघराने का व्यक्ति स्वयं चलकर प्रजा के सामने खडा होता है तो प्रजा तो वैसे ही धन्य हो जाती है ।अब यह अलग बात है कि प्रजा की यह आत्मीयता वोट में कहाँ तक तब्दील हो पाती है। क्योंकि यह जनता है भैय्या सब जानती है, तभी तो में लोकतन्त्र जिन्दा है.....। ______________________________________________________________________________________________________________मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ _______________________________________________________________________________________________________________
मीणा समाज के हमदर्द बनने के लिऐ जी जान से जुटे कुछ लोग अभी भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं है कि उन्हें करना क्या है......?एक तरफ सत्ताधरी पार्टी को समर्थन दिया जा रहा है तो दूसरी ओर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उसीके खिलाफ चुनाव के मैदान में ताल ठोक कर खडे हैं ।साथ ही सत्तधारी दल के अध्यक्ष के लिऐ चुनाव प्रचार का एलान भी कर रहें हैं । उनका कहना है कि सी. पी जोशी तो अच्छे इंसान हैं तो भला बुरा आदमी इस राजनीति में कौन मिलेगा सभी एक से एक आला दर्जे के भलमानुस ही तो आते हैं राजनीति मैं। हाँ यह अलग बात है कि लोगों का आंकलन करते समय हमारा नजरिया जरुर समय समय पर ,अपनी सुविधा के अनुसार बदलता रहता है।तभी तो किरोडी जी दोनों हाथ में लड्डू रखने के चक्कर में कभी उनकी प्रशंसा करते हैं तो कभी कोसना शुरू कर देते हैं।शायद अकेले में वे गुनगुनाते होंगे कि मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं बडी मुशकिल पडी है किधर जाऊं............?क्योंकि भले ही उन्होंने निर्दलीय पर्चा भर दिया हो लेकिन गहलोत साहब ने भी अभी आस नहीं छोडी है तभी तो अभी तक दरवाजे खुले हैं आखिर किरोडी जी एक अच्छे आदमी हैं........। _______________________________________________________________________________________________________________प्यार की झप्पीऔर पप्पी __________________________________________________________________________________________________________मुन्नाभाई यानि संजय दत्त साहब चुनावी भाषण में प्यार की झप्पी के साथ बहिन जी के लिऐ प्यार की पप्पी देने का ऐलान क्या किया कि प्रता्पगढ के डीएम का नोटिस जारी हो गया कि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है आप न तो प्यार की झप्पी देगें और न ही पप्पी.....? मुन्ना भाई सोचते होगें कि भला यह कैसा संहिता का चक्कर है तैश में कुछ बोलो तो भडकाऊ भाषण का डर प्यार से बोलो तो भी डर आखिर वे बेचारे करें भी तो क्या करें इससे अच्छे तो वे फिल्मों में ही थे ।वहां जब जिसे चाहा झप्पी दो जब मन चाहा पप्पी दो .... कोई झन्झट ही नहीं है किसी भी तरह का.............?अब इस झप्पी-पप्पी का जबाब किस भाषा में देना है इसके लिऐ किसी भले आदमी से ही सलाह लेनी होगी क्योंकि अभी तो पहले के केस ही नहीं सुलझ रहे है और राह चलतेअम्र सिंह के चक्कर में अब एक केस ओर गले पड जाऐगा.....?
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