जनजागृती पक्ष दैनिक समाचार-पत्र के स्थाई स्तम्भ में प्रकाशित व्यंग्य लेख
Friday, 8 May 2009
रंगत चुनाव की
(दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे कालम से दि.04/05/06)
आई.पी.एल.पर आई.पी एल भारी
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चुनावी सरगर्मियों का जायजा लेनेके लिऐ हमने भैय्या जी से पूछा-क्यों भैय्या जी कैसा चल रहा है चुनाव प्रचार....?हमारा यह पूछना था कि मायूस होकर बोले-क्या खाक चुनाव प्रचार....दिन में तो चिलचिलाती धूप पीछा नहीं छोडती और शाम के बाद सोचते हैं कि थोडा ठंडक में कुछ प्रचार किया जाऐ तो ससुरा ये टी.वी. लोगों का पीछा नहीं छोडता है...। _हम सोच में पड गये कि टी.वी. और चुनाव प्रचार का भला क्या लेना देना।हमने कहा--टी.वी. पर चानाव के लिऐ कोई विशेष धारावाहिक आ रहा है क्या.....? --अजी धारावाहिक को मारो गोली....आजकल तो सभी सीरियल की भी ऐसी -तैसी हो रही है इस क्रिकेट के भूत के कारण....? --क्रिकेट का भूत और टी वी पर क्या कह रहे हो भैय्या जी....? --आप भी भला क्यों समझकर भी अनजान बन रहे हैं। आपको मालूम है कि आजकल डबल-डबल आई.पी. एल.मैच चल रहे हैं.....। --आप क्या कहना चाह रहे हैं मुझे तो भैय्या जी कुछ समझ में नहीं आ रहा है ....? --आपको मालूम है कि एक आई.पी. एल, मैच क्रिकेट का चल रहा है अफ्रीका में जो कि पहले भारत में ही होने वाला था लेकिन यहाँ पर नेता जी को दूसरा आई. पी. एल. मैच जो करवाना था इसलिऐ क्रिकेट मैच जा पहुँचा अफ्रीका और नेता जी का आई.पी एल यानी-इण्डियन प्राइमिनिस्टर लीग मैच हो रहा है भारत में ......। देश के लोकतन्त्र के लिऐ ये मैच भी जरुरी हैं लेकिन हमारे देश की जनता है कि नेताओं को लिफ्ट ही नहीं दे रही है ।तभी तो यहाँ होने वाले राजनीतिक मैच फ्लाप हो रहे हैं लोग घरों से ही नहीं निकल रहे हैं। -- भैय्या जी आप ये क्या कह रहे हैं भला....क्या लोगों के लिऐ आजकल चुनाव से भी ज्यादा जरूरी क्रिकेट का मैच हो गया है.......। --आप किसी से भी पूछ लो कि आज कौन-कौन सी टीम का मैच होगा तो बच्चा-बच्चा भी बता देगा,लेकिन चुनाव के बारे में पूछो कि आपके यहाँ से कौन-कौन चुनाव लड रहा है तो दो नाम बताकर ही टांय-टांय फिस्स हो जाऐगा....! वास्तव में देखा जाऐ तो भैय्या जी की बात भी सही है ।शाम हुई नहीं कि सभी चिपक जाते हैं अपने-अपने घरों में टी.वी. के सामने...।अपने शहर में कितने उम्मीदवार चुनाव लड रहे हैं शायद ही किसी को मालूम हो। किसी से वोट की बात भी करो तो सीधा जबाब देता है कि हमें क्या.... कोई भी जीते और कोई भी हारे हमारी बला से......?अब देश के ऐसे पढ़े लिखे नासमझों को भला कॊई कैसे समझाऐ कि इन चुना्वों से आपको ही तो सबसे ज्यादा लेना देना है...आपको ही तो ध्यान रखना है कि हमारे देश का नेतृत्व अच्छे लोगों के हाथों में रहे ताकि हम विश्व में सम्मान से सिर उठा कर जी सकें और हमारा देश निरन्तर आगे बढ़ता जाऐ......।
रंगत चुनाव की
(जन जागृति पक्ष में मेरे कॉलम से दि.03/05/09)
जनता सब जानती है
चुनावी गर्माहट के साथ ही राजस्थान में मुख्य मन्त्री गहलोत और पूर्व मुख्य मन्त्री वसुन्धरा का वाकयुद्ध भी तेज होता जा रहा है।गहलोत जहाँ वसुन्धरा राज में हुऐ भ्रष्टाचार को कोस रहे हैं वहीं पर वसुन्धरा गहलोत के वित्तीय कुप्रबन्धन का राग अलाप रही हैं।दोनों ही एक दूसरे पर राजस्थान सरकार के काम काज को लेकर टांग खिचाई कर रहे हैं।दोनों की ही भाषा से लगता है कि इन्हें अभी तक भी इस बात का अहसास नहीं हो पाया है कि विधान सभा के चुनाव तो कभी के समाप्त हो गये अब लोकसभा के चुनाव आ गये हैं। खींचा तानी ही करनी है तो कोई राष्ट्रीय मुद्दालो और उस पर बहस करो....?सरकार दिल्ली की बननी है बातें राजस्थान सरकार की हो रही हैं। चुनाव का मात्र एक सप्ताह ही रह गया है अब तो कम से कम मुद्दे की बात पर आजाओ........? जयपुर से दिल्ली की राह की योजनाओं से जनता को अवगत कराओ।जनता को अपना घोषणा पत्र बताओ........!आपसी खीचतान में जनता को उल्लू क्यों बनाते हो भाई....जनता सब समझती है......लेकिन यह बात इन नेताओं को कौन समझाये कि ये गहलोत या वसुन्धरा की सरकार के चुनाव नहीं है लोकसभा के चुनाव है...........! ______________________________________________________________________________________________________________
कुछ तो धीर धरो लालू
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मौसम कैसा भी गरम क्यों न हो जाऐ लेकिन राजनीति में नेता जी का तापमान यदि बढ़ने लगता है तो यह उनकी सेहत के साथ ही राजनीति केलिऐ भी अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता ।लेकिन अपने रेल मन्त्रीजी हैं कि मौसम के साथ-साथ उनके दिमाग का पारा भी सातवें आसमान पर पहुँचने कग गया है । तभी तो सरे आम अपने सुरक्षा गार्ड को ही लताड दिया।एक तो चु्नाव का माहौल उसपर रोजाना बनते बिगडते राजनीतिक समीकरण.....हो सकता है कि चुनावी नतीजों की आहट आपके पक्ष में नहीं आ रही हो लेकिन इसका मतलब यह तो कदापि नहीं कि आप सरेआम किसी पर भी पिल जाऐं और कहीं भी किसी पर भी अपनी भडास निकालने लग जाऐं.....? जनता सब देख रही है सुन रही है.....यह जनता का दरबार है बन्धु ..आपकी लगाम फिलहाल तो जनता के ही हाथों में है....। ऊँट किस करवट बैठाना है यह तो जनता को ही तय करना है...इसलिऐ थोडा तो धैर्य धरियेगा वरना जनता तो जनता ही है. कि उसे क्या करना है। वो अभी तो सब कुछ कर सकती है,इसलिये संभलिऐगा कहीं ऐसा न हो कि बाद में यही कहना पडे कि अब पछताने से क्य फायदा जब चिडिया चुग गई खेत......?
Saturday, 2 May 2009
रंगत चुनाव की
( दैनिक जन जागृति पक्ष में मेरे कॉलम से दि.02/04/09 )
कॉग्रेसी बनो युवराज जी
देश में आधी से भी अधिक सीटों पर चुनाव हो चुके हैं। एक सप्ताह बाद राजस्थान में भी चुनाव हो जाऐगें।परन्तु कॉग्रेस पार्टी अभी तक भी कोटा बून्दी से पार्टी के प्रत्याशी महाराज कुमार इज्यराज सिंह् को कॉग्रेसी बनाने के प्रयास में ही जुटी है। ये हम नहीं कॉग्रेस के ही महामन्त्रि जी की सलाह है।वैसे हमने तो सोचा था कि इतनी बडी पार्टी है उन्होंने किसी कॉग्रेसी को ही टिकिट दिया होगा लेकिन असली पोल तो पार्टी के महामन्त्री दिग्विजय सिंह ने पार्टी के सम्मेलन में ही यह कहकर खोल दी कि "युवराज को पूरी तरह से कॉग्रेसी बनायें".....।हमें ही क्या आपको भी आश्चर्य हुआ ही होगा कि अधूरे कॉग्रेसी को यहाँ से प्रत्याशी बनाया गया हैं। शायद उनके पास पूरा कॉग्रेसी प्रत्याशी नहीं था या फिर पूर्ण कॉग्रेसी पर पार्टी को ऐतबार नहीं था। अब हकीकत क्या है यह तो आलाकमान ही बता सकता है लेकिन हम जैसे कम बुद्धी वालों के लिऐ तो धर्म संकट खडा हो गया है कि आधे अधूरे कॉग्रेसी को वोट दे या फिर या फिर महाराज कुमार को.....या अन्य किसी उम्मीदवार को ही टटोला जाये............??_______________________________________________________________________________________
वाह नेता जी
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राजस्था सरकार केगृह-मन्त्री जैसे जिम्मेदार पद को सुशोभित कर चुके नेता जी भी चुनावी गर्मी में आपा ही खोते जा रहे हैं । न जाने उन्हें अचानक क्या हो गया कि गॉधी नहरू परिवार पर डंडा लेकर पिल गये । एक दूसरे की टांग खिचाई तो खैर कोई बात नही लेकिन एक जिम्मेदार नेता होने के नाते आप तो गाली गलोच पर ही उतर आये। देश को अनुशासन की सीख देने वाले और कानून व्यवस्था को बनाने रखने की जिम्मेदारी का निर्वाह कर्ने की ओरों को सॊख देनेवाले आज स्वयं ही गाली गलोच जैसी भाषा पर उतारू होने लगें तो आम आदमी को भला वे कैसे समझा सकते हैं.......।--
रंगत चुनाव की
जनता सब जानती है
गर्माहट के साथ ही राजस्थान में मुख्य मन्त्री गहलोत और पूर्व मुख्य मन्त्री वसुन्धरा का वाकयुद्ध भी तेज होता जा रहा है।गहलोत जहाँ वसुन्धरा राज में हुऐ भ्रष्टाचार को कोस रहे हैं वहीं पर वसुन्धरा गहलोत के वित्तीय कुप्रबन्धन का राग अलाप रही हैं।दोनों ही एक दूसरे पर राजस्थान सरकार के काम काज को लेकर टांग खिचाई कर रहे हैं।दोनों की ही भाषा से लगता है कि इन्हें अभी तक भी इस बात का अहसास नहीं हो पाया है कि विधान सभा के चुनाव तो कभी के समाप्त हो गये अब लोकसभा के चुनाव आ गये हैं। खींचा तानी ही करनी है तो कोई राष्ट्रीय मुद्दालो और उस पर बहस करो....?सरकार दिल्ली की बननी है बातें राजस्थान सरकार की हो रही हैं। चुनाव का मात्र एक सप्ताह ही रह गया है अब तो कम से कम मुद्दे की बात पर आजाओ........? जयपुर से दिल्ली की राह की योजनाओं से जनता को अवगत कराओ।जनता को अपना घोषणा पत्र बताओ........!आपसी खीचतान में जनता को उल्लू क्यों बनाते हो भाई....जनता सब समझती है......लेकिन यह बात इन नेताओं को कौन समझाये कि ये गहलोत या वसुन्धरा की सरकार के चुनाव नहीं है लोकसभा के चुनाव है...........! ______________________________________________________________________________________________________________
कुछ तो धीर धरो लालू जी
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मौसम कैसा भी गरम क्यों न हो जाऐ लेकिन राजनीति में नेता जी का तापमान यदि बढ़ने लगता है तो यह उनकी सेहत के साथ ही राजनीति केलिऐ भी अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता ।लेकिन अपने रेल मन्त्रीजी हैं कि मौसम के साथ-साथ उनके दिमाग का पारा भी सातवें आसमान पर पहुँचने कग गया है । तभी तो सरे आम अपने सुरक्षा गार्ड को ही लताड दिया।एक तो चु्नाव का माहौल उसपर रोजाना बनते बिगडते राजनीतिक समीकरण.....हो सकता है कि चुनावी नतीजों की आहट आपके पक्ष में नहीं आ रही हो लेकिन इसका मतलब यह तो कदापि नहीं कि आप सरेआम किसी पर भी पिल जाऐं और कहीं भी किसी पर भी अपनी भडास निकालने लग जाऐं.....? जनता सब देख रही है सुन रही है.....यह जनता का दरबार है बन्धु ..आपकी लगाम फिलहाल तो जनता के ही हाथों में है....। ऊँट किस करवट बैठाना है यह तो जनता को ही तय करना है...इसलिऐ थोडा तो धैर्य धरियेगा वरना जनता तो जनता ही है. कि उसे क्या करना है। वो अभी तो सब कुछ कर सकती है,इसलिये संभलिऐगा कहीं ऐसा न हो कि बाद में यही कहना पडे कि अब पछताने से क्य फायदा जब चिडिया चुग गई खेत......?
रंगत चुनाव की
विवाह सम्मेलनों में चुनावी खिचडी
एक तो मौसम की गर्मी,दूसरी ओर शादियों की भरमार और उसपर चुनावी मौसम है कि नेताजी को दौड लगाने को मजबूर किये जाता है । वे सभी को अपनी कहानी सुनाने को बेताब है । किसीकी शादी हो या अन्य कैसा भी जरूरी काम हो आजकल नेता जी को बस एक ही फितूर सवार है कि कैसे भी अधिक से अधिक लोगों से मुलाकात की जाऐ।सामूहिक विवाह सम्मेलन आजकल नेताजी बडा पसन्द आ रहा है । अब नेता जी भले ही किसी भी पार्टी के हों सा्मूहिक विवाह सम्मेलन में चुनावी खिचडी का तडका तो लग ही जाता है। सभी जाति और पार्टी के नेताजी सम्मेलन की खुशबू लगते ही वहाँ हाजरी लगाने की पूरी-पूरी कोशिश में रहते हैं।एक साथ अनेक लोगॊं से मुलाकात तो हो ही जाती है साथ ही चुनावी राम-राम भी हो जाती है ।वहाँ इनके वोटर कितने हैं भला इस बात से किसी को क्या लेना -देना......। नेता जी के साथ चलने वाले लश्कर को तो बस यह सन्तुष्टी हो जाती है कि आज इतने लोगों से मुलाकात हो गई । अब नतीजा क्या रहेगा ये तो राम ही जाने, हमारा तो काम है सो कर दिया.....वैसे भी ऐसी तपती दुपहरी में सम्मेलनों में मेल-जोल बढाने से अच्छा हो भी क्या सकता है।सम्मेलन वाले भी धन्य और नेताजी तो धन्य हो ही जाते हैं। _____________________________________________________________________________________________________________ जागो....अब तो जगो......! _______________________________________________________________________________________________________________ कल ही महा नगर के एक जागरुक दिखने वाले जीव से हमने पूछ-आपके यहाँ से कौन-कौन चुनाव में खडे हो रहे हैं ?वे बोले -पता नहीं.....। हमें आश्चर्य हुआ कि कैसा भरतीय नागरिक है और वह भी पढा लिखा पोस्ट ग्रेजुएट..?हमने फिर भी हिम्मत कर पूछा- किस -किस पार्टी के उम्मीदवार चुनाव लड रहे हैं - वो फिर बोले - पता नहीं......?हम परेशान कैसा प्राणी है। हमने फिर भी सावाल किया -आप रहते कहाँ हैं -वे सज्जन झल्लाकर बोले -आपको परेशानी क्या है, यहीं रहता हूँ। सरकारी कर्मचारी हूँ । बोलो क्या कर लोगे....? भला हम क्या कर सकते थे ?फिर भी हमने उन्हें समझाया कि आप भारतीय नागरिक हैं संविधान ने आपको मौका दिया है आपकी मन पसन्द सरकार चुनने का तो कम से कम तुम्हें यह तो मालूम होना ही चाहिये कि तुम्हारे क्षेत्र से कौन -कौन लोकसभा में जाना चाहता है और तुम भी अच्छी सरकार को चुनने में भगीदार बनों....?वे तपाक से बोले- भाई साहब सरकार किसी की भी बने मुझे उससे क्या लेनादेना। सरकार से मुझे वेतेन तो बराबर ही मिलेगा वोट दूं तब भी और वोट नहीं दूगा तब भी...?अब सोये हुऐ पढेलिखे लोगों को भला कौन कैसे समझाऐ कि सरकार का चुनाव करना हमारा कर्तव्य ही नहीं अधिकार भी है और हर जागरुक नागरिक को इस अधिकार का पूरा-पूरा उपयोग करना चाहिऐ....।नही तो गलत लोगों के चयन पर पाँच साल तक तुम्हें पछताना होगा। इसलिऐ जागो बन्धु जागो.......अब तो जाग ही जाओ......!
Friday, 24 April 2009
चुनावी हलचल
वसुन्धरा का झालावाड में डेरा
राजस्थान विधान सभा में काग्रेस पार्टी की सरकार बनने के बाद काग्रेस जनों में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है। और राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशो्क गहलोत लोक सभा चुनाव में टारगेट 25 लेकर चल रहें है । यहाँ से लोकसभा की पच्चीस सीटे हैं। दूसरी ओर भाजपा की पूर्व मुख्य मन्त्री वसुन्धरा राजे और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष माथुर पिछली बार लोकसभा की कुल 21 सीटों को बरकरार रखने पर ध्यान दे रहे हैं।
मगर इस बार स्थिति बसुन्धरा राजे के लिऐ थोडा विकट बनी हुई है।वे चुनाव प्रचार में अपने पुत्र की सीट झालावाड -बॉरा पर ही अटकी हुई हैं उन्हें प्रदेश के अन्य क्षेत्र देखने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। जब से काग्रेस की तरफ से उर्मिला जैन को उम्मीदवार घोषित किय गया है तभी से वसुन्धरा की नींद हराम हो गई है हाँलाकि उर्मिला नई उम्मीदवार है और पहली बार ही चुनाव लड रही है। लेकिन उनके पक्ष में सबसे मुख्य बात यह है कि झालवाड उनका ननिहल है और बॉरा उनका ससुराल है। साथ ही साथ बारा के ही प्रमोद जैन जो कि राजस्थान सरकार में सार्वजनिक निर्माण मन्त्री हैं ,उनके पति भी है,उनका बॉरा क्षेत्र में अच्छा प्रभाव है।गत विधान सभा में चारों सीटो पर, प्रमोद जैन के ही प्रयासों से काग्रेस ने कब्जा किया था। इसका प्रभाव लोकसभा में भी निश्चित ही पडेगा । इसी डर के कारण वसुन्धरा ने झालावाड-बॉरा में ही डेरा डाल रखा है।प्रमोद जैन की साफ-सुथरी छवि का फयदा कॉग्रेस को मिलेगा ही ऐसे अनुमान अभी से ही लगाऐ जा रहे हैं।
झालावाड की सीट पिछले बीस वर्षो से पहले वसुन्धरा और अब उनके पुत्र दुष्यन्त सिंह के पास है। इस बार दुष्यन्त सिंह के् सामने मैदान में उर्मिला का आना पूर्व मुख्य मन्त्री को बैचेन करने का मुख्य कारण रहा है ।
इस सीट पर बेटे को विजय दिलाने के लिऐ एक माँ सब कुछ करने को तैयार है। पिछले दिनों विधनसभा चुनाव के समय या उसके पहले आपसी मन मुटाव के कारण जिन लोगॊं को भाजपा ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था उन सभी को मनाने का सिलसिला जारी है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो कि बसुन्धरा राजे को फूटी आँख भी नहीं सुहाते थे क्योंकि गुर्जर आन्दोलन के समय उनके बीच की खाइयां इतनी बढ चुकी थी जिससे लगता था कि अब इनका नजदीक आना नामुनकिन है । लेकिन सभी बातों को भुलाकर वे इन नेताओं के घर जाकर स्वयं पार्टी में वापस ला रही हैं।ताकि जहाँ से भी थोडा बहुत सहारा मिल सके ले लिया जाऐ और किसी भी तरह बेटे को विजयी बनाना ही उनका अन्तिम लक्ष्य बनता जा रहा है। और इसमें राज्य पर घ्यान देना सम्भव नहीं हो पा रहा है।
परिणाम क्या होगा यह तो समय ही बताऐगा लेकिन इतना तय है कि इस क्षेत्र से जीत या हार दोनों ही वसुन्धरा की व्यक्तिगत जीत हार ही होगी। क्योंकि उनके पुत्र दुष्यन्त सिंह का इस जीत या हार में कोई विशेष हाथ नहीं होगा । भाजपा को यहाँ से वोट केवल वसुन्धरा के नाम पर ही मिलेगें न कि दुष्यन्त सिंह के नाम पर ।गत पाँच वर्षों में यहाँ के लोग इन्हें केवल महारानी साहिबा के पुत्र के रूप में जानते हैं।
डॉ. योगेन्द्र मणि
महारानी जी घर आई हो राम जी
(दैनिक जन्जागृति पक्ष के मेरे कॉलम से दि.24/04/09 )
महारानी जी घर आई हो राम जी
मेडम रूठे हुऐ नेता जी को मनाने उनके घर पहुँचीतो नेता जी का पूरा परिवार ही मेडम के स्वागत के लिऐ तैयार था। मालाऐं पहिनाई गई ,छाछ पिलाई, मिठाई भी खिलाई। सभी प्रसन्न.....। खास तौर से नेता जी और मेडम यानि कि महारानी जी.....।सभी की बाँछे खिली थी।प्रसन्नता होनी भी चाहिऐ....राजस्थान की महान हस्ति जो पधारी थी, नेता जी को वापस घर बुलाने के लिऐ और उनका साथ माँगने के लिऐ......? घर के सदस्यों की खुशी से ऐसा लग रहा था जैसे हर कोई गुनगुना रहा हो -महारानी जी घर आई हो राम जी.......! एसे में जुम्मन चाचा ने चाय की चुस्की लेते हुऐ भैय्या जी को छेडते हुऐ कहा-कल तक महारानी जी को पानी पी-पीकर कोसने वाले नेताजी अचानक महारानी जी की शरण में कैसे आ गये...? भैय्या जी तपाक से बॊले-नेता जी महारानी जी की शरण में नहीं आऐ हैं वो तो स्वयं ही आई थी नेता जी के द्वार पर....।जुम्मन चाचा बोले-बात तो एक ही हुई....ये गये या वो आई, क्या फर्क पडता है........? --फर्क कैसे नहीं पडता है....? अभी जरूरत तो उन्हीं को है न अपने बेटे के लिऐ......और पार्टी की साख बचाऐ रखने के लिऐ ।नेता जी का क्या वे तो आराम से बैठे थे.......? _भैय्या जी हकीकत तो ये है कि जरूरत तो नेता जी को भी थी.....। उन्हें तो जमीन पर पैर रखने की भी जगह नहीं दिख रही थी। वह तो किस्मत अच्छी थी जो वे ही आगे होकर आ गई।वरना कॉग्रेस ने तो आयना दिखा ही दिया था......। ऐन समय पर उन्हें चोराहे पर लाकर खडा कर दिया....आखिर जाते भी तो कहाँ जाते नेता जी .....? --आप भी जुम्मन चाचा क्या बात करते हो ....हमारे नेता जी आखिर गुर्जर समाज के नेता हैं । -शायद समाज की उसी नेतागिरी को भुनाने की कोशिश में लगे थे नेताजी.......! तभी तो समाज के नाम पर हीरो बने एक नेता जी ने तो पहले ही भाजपा से टिकिट ले ही लिया अब ये भी कुछ पुरुस्कार पाने की उम्मीद में वापस आ गये शायद......? इन्हें लगता है कि इनके समाज की याद्दास्त बहुत कमजोर है शायद इसीलिऐ आरक्षण के नाम पर सैंकडों नारियों की मांग से सिन्दूर पौछने वालों के ही साथ आज ये वापस कन्धे से कन्धा मिलाकर खडे हैं।उन विधवाओं का सामना करने में इनके पैर नहीं डगमगाऐगें क्या......? --जुम्मन चाचा ये राजनीति है इसमें काहे की शर्म......!हमारे नेता जी ने तो कह दिया है कि राजनीति में कोई व्यक्तिगत दुश्मन नहीं होता.....।अब तुम अपने ही घर को ले लो पिछले साल जब तुम्हारा बेटा तुमसे नाराज होकर चला गया था घर से निकल कर ,तब तुम भी उसे मना कर वापस घर लेकर आये थे कि नहीं......?अब पार्टी भी तो इनका घर ही है उन्होंने मनाया और ये मान गये बस बात खत्म......!काहे को जरा सी बात को लम्बी किये जा रहे हो तुम भी......? वैसे बात भी सही हैवे रूंठे मनाये हमें क्या लेकिन जो बच्चे इनकी राजनैतिक रोटियों के चक्कर में अनाथ हो गये.......जिनका सुहाग उजड गया......जिन बहिनों के हाथ की राखियां हमेशा के लिऐ उनके हाथों में ही रह गई उनक भला इनकी राजनीति से क्या लेना देना था....?इन सब सवालों का जबाब तो इन्हें देना ही चाहिऐ.....?
डॉ. योगेन्द्र मणि
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